कानून के बाद भी महिलाएं वेबस
April 15, 2019 • डॉ इंदिरा मिश्रा,संपादिका सर्वांगीण

                                                   

 

दहेज विरोधी कानून की धारा 498-ए महिला की प्रताड़ना रोकने में सक्षम होते हुए भी असहाय नजर आती है क्योकी दहेज उत्पीड़न के  ज्यादातर मामलें आज भी दर्ज नही होते है और अगर हो भी जाते हैं तो उनमें चार्जशीट नहीं होती। स्वयं सेवी संस्था सेंटर फार सोशल रिसर्च ने दिल्ली, कर्नाटक, राजस्थान और पश्चिम बंगाल राज्यों में महिलाओं " के हित मे बने कानूनों को लेकर एक कराया। सर्वेक्षण का परिणाम बताता है कि इन राज्यों में घरेलू हिंसा और दहेज के मामले बढ़े हैं । दहेज विरोधी कानून की धारा 498-ए में जो मामले दर्ज होते हैं और जिन पर चार्जशीट दाखिल होती है उनमें भी भारी अंतर पाया गया।

वर्ष 2003 में दहेज संबंधी जो अंतर पाया गया। वर्ष 2003 में दहेज संबंधी जो मामले दर्ज हुए उनमें से 64 प्रतिशत में ही चार्जशीट दाखिल हुई। 25 प्रतिशत में सुलह हो गई और 10 प्रतिशत झूठे या गलत बताए गए। 0.3 प्रतिशत मामले पहले ही रद्द हो गए। इन चारों राज्यों की कमोबेश यही स्थिति है। घरेलू हिंसा की जितनी शिकायतें आती हैं उसके मुकाबले चार्जशीट बहुत कम में होती है। राजस्थान, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और दिल्ली में पति और उसके संबंधियों द्वारा सताई गई महिलाओं की संख्या में खासी बढ़ोतरी हुई है। 1999 स ये मामले बढ़ने पर हैं। सन् 2000 से 2001 तक दिल्ली को छोड़कर शेष तीन राज्य में वृद्धि काफी तेज है। राजस्थान पुलिस वार्षिक रिपोर्ट का वार्षिक रिपोर्ट (1999) के  अनुसार 1997-1999 के दौरान दहेज हत्याओं में 24.43 प्रतिशत की वृद्धि हुई। कर्नाटक और पश्चिम बंगाल में घरेलू हिंसा के मामले तेजी से बढ़े। पति और उसके संबंधियों द्वारा प्रताड़ित महिलाओं के मामले राजस्थान में 1999 से 6000 के लगभग थे जो 2003 में बढ़ कर 12,000 से ज्यादा हो गए। पश्चिम बंगाल में ये मामले 4000 से ज्यादा थे जो 2003 में 8000 के लगभग पहुंच गए। कर्नाटक में यह आंकड़ा 1999 से 2003 के बीच 2000 से बढ़कर 6000 के ऊपर चला गया। देश की राजधानी दिल्ली में 1999 में ऐसे मामले बहुत ही कम थे जो 2003 तक आते-आते 2000 का आंकड़ा पार कर गए। है  इससे यह तथ्य तो स्पष्ट होता है कि उत्पीड़न महिलाओं के प्रति जहां अपराध बढ़े हैं समस्या वहीं दोषियों को सजा की दर में  चिंताजनक गिरावट आई है। अध्ययन से यह बात भी सामने आई कि पीड़ितों के सामने असली मुश्किलें धारा 498-ए में मामला दर्ज करने के बाद आती हैं। यह बात भी सामने आई कि पीड़ितों के सामने असली मुश्किलें धारा 498-ए में मामला दर्ज करने के बाद आती हैं। मानसिक क्रूरता और कभी-कभी मानसिक क्रूरता और कभी-कभी शारीरिक क्रूरता को अदालत में साबित करना बहुत कठिन है। इन चार राज्यों में यह बात भी सामने आई कि महिलाओं को इस महत्वपूर्ण धारा की जानकारी बहुत कम थी। जिन थोडी-बहोत को थी भी, उनकी राय है कि ये मामले जल्दी सुलझाए जाने चाहिए,तभी यह धारा कारगर सिद्ध हो सकती है। दूसरी तरफ अभियुक्तों की मांग है कि धारा 498ए सिर्फ पति तक सीमित होनी चाहिए। परिवार के अन्य  सदस्यों विशेषकर बूढ़ो और बच्चों पर यह लागू नहीं होनी चाहिए। समाज में एसी कानून व्यवस्था होनी  चाहीयें जिससे सभी वर्गो के साथ न्याय हो ।