तीन तलाक बिल - आग़ाज़ ...एक नयी जिंदगी का
August 12, 2019 • डॉ. इंदिरा मिश्रा

 

डॉ. इंदिरा मिश्रा ...मुस्लिम महिलाओं को मिली है जिंदगी की नई किरण

आजादी के  इतने वर्ष पूरे होने के बाद भी मुस्लिम महिलाएँ अपने ही समुदाय में काफी चुनौतियों का सामना कर रही थी और दयनीय परिस्थितियों में रह रही थी। त्रासदीपूर्ण बात तो यह है कि मुस्लिम महिलाओं ने नियति मानकर अपनी स्थिति और भूमिकाओं को स्वीकार कर लिया था  जो उनके लिए पुरूष सत्तात्मक समाज ने नियत की थी। शरियत का पालन करनेवाले कुछ मौलवियों ने अपने स्वार्थ के लिए हर बार धर्म की हिफाजत की आड़ लेकर औरत को अपने पैरों की जूती बनाने की कोशिश की है।”

अक्सर 'मुस्लिम औरत' नाम आते ही घर की चारदिवारी में बंद या पर्दे में रहनेवाली स्त्री का चेहरा सामने उभरकर आता है। समय के साथ-साथ मुस्लिम समाज में स्त्रियों के रहन-सहन, पहनावा और बुर्कों में भी परिवर्तन आ रहे है। सदियों से सांस लेती औरत ने जब अपनी आजादी के आसमान की तमन्ना की तो सबसे पहली जंग उसे अपने धर्म से लड़नी पडी। धर्म की हैसियत किसी तलवार जैसी है जो औरत के सर पर वर्षों से लटक रही है। औरत इस तलवार के विरुद्ध जाती है तो वह अवज्ञाकारी, विरोधी तो कभी बेहया और वेश्या भी ठहरा दी जाती है।

एक  गम्भीर मुद्दा जो उनकी सामाजिक स्थिति को प्रभावित करता है वह है "ट्रिपल तलाक" यानी तीन बार तलाक-तलाक-तलाक कह दिया और तलाक हो गया, इसका असर यकीनी तौर पर मुस्लिम महिलाओं की स्थिति पर होता है, इसकी शिकार अधिकांश गरीब मुस्लिम महिलाएँ होती हैं।

लोकसभा में मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक 2019 जिसे तीन तलाक बिल (तलाक ए बिद्दत) कहा जाता है को दंडनीय अपराध बनाने वाले बिल को कानूनी रूप देने के लिए अध्यादेश को पिछले सप्ताह पारित किया गया थाजिसके बाद राज्यसभा ने 84 के मुकाबले 99 मतों से इसे पारित कर दिया। राष्ट्रपति के इसे मंजूरी देने के बाद अब पत्नी को तीन तलाक देने वाले मुस्लिम पुरुष को तीन साल तक की सजा हो सकती है।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) का दावा है कि शरीयत ट्रिपल तलाक की वैधता को बरकरार रखती है।तलाक, दो तरीकों से प्राप्त किया जा सकता है। `तालक-उल-सुन्नत'के तहत, एक पति द्वारा "तालाक" के उच्चारण और कानूनन अलगाव के बीच, तीन महीने की अवधि को `इद्दत' कहा जाता है। लेकिन 'तालक-ए-बिदत' एक आदमी को एक ही बैठक में ऐसा करने के लिए अधिकृत करता है।

हालांकि, विगत वर्षों में, ट्रिपल तालक के खिलाफ एक अभियान - जो विशेषज्ञों का कहना है कि कुरान में कोई उल्लेख नहीं है - एक आंदोलन के रूप में उभरा है। संपूर्ण ट्रिपल तलाक मुद्दा संस्कृति बनाम युद्ध का मैदान बन गया है। महिलाये क्या महसूस करती हैं जब इस तरह से सिर्फ एक लब्ज के तीन बार बोलने से उनकी और उनके बच्चों की पूरी जिदगी ही एक विराम पर आ जाती है, यह समझने की जरूरत है। यहाँ तक कि आजकल के टेक्निकल जमाने में वॉट्सएप, ईमेल, फोन, चिट्ठी जैसे अजीब तरीकों से तलाक फेसबुक या सिर्फ मोबाइल पर एक मेसेज डाल देने भर से ही पुरुष अपनी विवाहिता व् अपने बच्चों की माँ को बेसहारा छोड़ देता है। यह महिलाओं के बुनियादी मानवाधिकारों का हनन है।

इससे मुस्लिम महिलाओं का उत्पीड़न रुकेगा एवं कुप्रथा से आजादी मिलेगी। कई इस्लामिक देशों में तीन तलाक पर पहले ही प्रतिबंध लगाया जा चुका है और अब भारत में भी इस पर प्रतिबंध लगाने से मुस्लिम महिलाओं को फायदा होगा।

सरकार ने तीन तलाक विधेयक के जरिए शादी जैसे मामले को सिविल लॉ से क्रिमिनल ऑफेंस में बदल दिया। आमतौर पर शादी जैसे मामले सिविल लॉ में आते हैं। इस कानून को सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर लाई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कभी भी तीन तलाक को क्रिमिनल ऑफेंस नहीं माना। सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को सिर्फ असंवैधानिक और गैर-कानूनी करार दिया था। लेकिन सरकार ने इसे क्रिमिनल ऑफेंस बता दिया है। 

संसद से पारित विधेयक के कानून बन जाने पर वॉट्सएप, ईमेल, एसएमएस, फोन, चिट्ठी जैसे अजीब तरीकों से तलाक देने पर रोक लगेगी। कई मामले ऐसे भी आए, जिसमें पति ने वॉट्सऐप या मैसेज भेजकर पत्नी को तीन तलाक दे दिया। प्रथा के मुताबिक, ऐसे मामलों में अगर किसी पुरुष को लगता था कि उसने जल्दबाजी में तीन तलाक दिया है, तब भी तलाक को पलटा नहीं जा सकता था। तलाकशुदा जोड़ा फिर हलाला के बाद ही शादी कर सकता था। तीन तलाक के बाद पहले शौहर के पास लौटने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया निकाह हलाला कहलाती है। इसके तहत महिला को अपने पहले पति के पास लौटने से पहले किसी और से शादी करनी होती है और उसे तलाक देना होता है। सेपरेशन के वक्त को इद्दत कहते हैं। इस कानून के बाद मुस्लिम औरतों को सम्मान से समझौता नहीं करना पड़ेगा । 

तीन तलाक मुक्त समाज पर आम से खास लोगों  की प्रतिक्रिया

बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री श्यामजाजू ने मोदी जी की निर्णय क्षमता को सलाम करते हुए कहते हैं कि  मिलने आई मुस्लिम बहनों  का एक ही नारा था  ट्रिपल तलाक़ हारा है मोदी जी का साहरा है। संघ के वरिष्ठ एवं राष्ट्रिय मुस्लिम एकता मंच के नेता श्री इंद्रेश कुमार जी का कहना है कि तीन तलाक विधेयक का पास होना तीन वजहों से बड़ा फैसला है। पहला- मुस्लिम पर्सनल लॉ में संसद के जरिए बदलाव किया गया है। दूसरा- इसे समान नागरिक संहिता की शुरुआत माना जा सकता है। तीसरा- यह महिलाओं के सम्मान की दिशा में उठाया गया कदम है। जबकि जामिया की प्रोफ़ेसर सबिहा हुसैन मानती है की इससे हो सकता है कि तलाक़ में कमी आए पर बहु विवाह को और बढ़ावा मिलेगा सरकार को इस ओर भी ध्यान देना चाहिए इस बात का समर्थन महिला दक्षता समिति की प्रधान श्रीमती सुमन कृष्ण कांत ने की हैं। समाज सेविका अनीता अग्रवाल कहती है की मुस्लिम महिलाओं के सम्मान  के लिए सराहनीय कदम है एडुकेशनल फोरम फॉर वीमेन जस्टिस में आई पीड़ता फ़रज़ाना बहुत ही खुश नज़र आती है। मुस्लिम नेत्री लक्ष्मी नगर शबाना रहमान एवं चांदनी चौक से फ़रहाना अन्जुम कहती हैं कि अल्लाह के घर देर है अन्धेर नहीं। मोदी सरकार का  दिल से शुक्रिया जिसने इस कुरीति को मिटाने की हिम्मत जुटाई।   

तीन तलाक के आकड़ों पर एक नज़रसुप्रीम कोर्ट के फैसले से अब तक तीन तलाक के आंकड़े देखें तो जनवरी 2017 से 13 सितंबर 2018 तक 430 तीन तलाक की घटनाएं मिली हैं। इनमें से229 सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट से पहले के हैं, जबकि 201 जजमेंट के बाद के हैं। 3 तलाक के सबसे ज्यादा मामले यूपी में आए। यूपी में जनवरी 17 से पहले126 केस आए। फैसले के बाद 120 केस सामने आए। (नवभारतटाइम्स.कॉम | Updated: 25 Jul 2019)

महिलाओं का संघर्ष :

पहले 1985 और अब 2019, 34 साल में दो मौके ऐसे आए, जब तीन तलाक का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में जाने के बाद संसद तक पहुंचा और इस पर कानून बना। 1985 में शाहबानो थीं, जिन्हें हक दिलाने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद के जरिए कानून बनाकर पलट दिया गया था।  40 साल की सायरा बानो ने तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सायरा को उनके पति ने टेलीग्राम से तलाकनामा भेजा था। सायरा की याचिका पर ही अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाकर तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया था।

इस ऐतिहासिक बिल को अंजाम तक पहुंचाने में कई महिलाओं का संघर्ष शामिल रहा है। जहाँ धर्म की बेड़ियां तोड़ कर औरत जब चीखी तो उसकी चीख से आसमान में भी सूराख पैदा हो गया पुरुषसत्तात्मक समाज को डर महसूस होने लगा। “वो जब आजादी का ऐलान करती है तो बेरहम से बेरहम मर्दों से भी हजारों गुना आगे बढ़ जाती। इस बार संसद ने ऐसा विधेयक पारित किया है, जिससे तीन तलाक अपराध की श्रेणी में आ गया। यह विधेयक शाहबानो व् सायरा बानो, इशरत जहां जैसी महिलाओं के लिए याद रखा जाएगा। उनके अलावा आफरीन रहमान, गुलशन परवीन, इशरत जहां और अतिया साबरी उन महिलाओं में है जिन्होंने तीन तलाक के खिलाफ आवाज बुलंद की। इनमें से किसी को फोन पर तलाक मिला था, किसी को स्पीड पोस्ट से, किसी को स्टांप पेपर पर तो किसी को कागज के एक टुकड़े पर।

शाहबानो आज अगर जिंदा होतीं तो बेहद खुश होतीं। जिस लड़ाई की शुरुआत उन्होंने की थी, उसमें जीत तो उन्हें 7 साल बाद ही मिल गई थी, लेकिन तत्कालीन सरकार की वजह से उन्हें हक नहीं मिल पाया था। वहीं अब 33 साल बाद शाहबानो और उनकी जैसी तमाम मुस्लिम महिलाओं को न्याय मिल गया है, लेकिन ये सब देखने को लिए आज शाहबानो जिंदा नहीं हैं। हालांकि इस खबर से खुदा के पास उनके आत्मा को सुकून जरूर मिलेगी।

तीन तलाक बिल के पास होने पर देश भर की मुस्लिम महिलाओं ने खूब जश्न मनाया व् एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर अपनी खुशी का इजहार किया है । महिलाओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार जताया है। इस दौरान महिलाओं के चेहरे पर सुकून व मौजूदा केंद्र की सरकार के प्रति विश्वास की झलक देखने को मिली।  महिलाओं का कहना है कि, अब उन्हें इस कुरीति का सामना नहीं करना पड़ेगा। तीन तलाक शोषण का एक जरिया बन चुका था।