दासता की मानसिकता से मुक्त होकर नारी स्वयं करे अपना विकास
June 17, 2019 • Sarvangin

 

 

डॉ. इंदिरा मिश्रा

यदि नारी उत्थान में रूकावट पुरूष वर्ग है तो स्त्रियों का भी उसमें योगदान कम नहीं है। परिवारों में सास-बहू, ननद-भाभी आदि के संघर्ष जगजाहिर है।  ऐसा हंसी सर्वथा उत्थान आदि कर वह आज अपने आप को हंसी का पात्र बनाती है और फिर नारी शोषण की सारी जिम्मेदारी पुरूष वर्ग पर डाल दी जाती है जो सर्वथा अनुचित है। यदि नारी उत्थान में रूकावट पुरूष वर्ग है तो स्त्रियों का भी उसमें योगदान कम नहीं है। इन सब झगड़ों व अत्याचारों का कारण यह हो सकता है कि नारी अपने ऊपर हुए अत्याचार का प्रतिशोध घर की अन्य स्त्रियों से लेती है। स्वयं हम अपने जीवन में देखते हैं कि नारी आंदोलन में भाग लेने वाले स्वयं घर में स्त्री का शोषण करने से बाज नहीं आते हैं। यदि यह संभावना कुछ प्रतिशत तक भी सत्य होती है तो नारी स्वयं नारी की प्रगति में बाधक सिद्ध होती है।

अब यदि नारी को प्रगति रथ पर आगे बढ़ना है तो एक स्त्री को नहीं, वरन संपूर्ण स्त्री समाज को जागृत होना होगा। नारी समस्याओं व तकलीफ की जानकारी सिर्फ नारी को ही हो सकती है। अत: परिवार में घर के बाहर उसे अत्याचार के विरुद्ध कदम उठाना चाहिए। यदि वह सास है तो बहू पर दहेज के कारण होने वाले अत्याचारों का विरोध करना चाहिए। यदि वह मां है तो पुत्री को उचित शिक्षा दें जिससे पुरूषों से हीनता का उसे अनुभव न हो। पुत्री (कन्या) जन्म के समय वह दुख अथवा समाज के दबाव में खोखली प्रसन्नता प्रकट न करें। तभी नारियां अपने आपको मानसिक दासता से मुक्त करा पायेगी।

जिस प्रकार स्त्री ने आज तक महान पुत्रों की मां होने का गौरव प्राप्त किया है, तो उसे महान पुत्रियों की माता बनने से कौन रोक सकता है? कब आयेगा वह समय, जब एक दो नहीं वरन अधिक संख्या में नारियां उद्घोष करेंगी कि हमारी सफलता के पीछे हमारी मां अथवा बहन, सास या सहेली का महत्त्वपूर्ण योगदान हैं। निश्चित तौर पर वह समय आज का है। एक-एक नारी को जागकर अन्य स्त्रियों की सुप्त चेतना को जगाना होगा, तभी नारी प्रगति सार्थक हो सकती है। आज उन्हें यह जानना होगा कि अपने शोषण के पीछे उनकी अपनी मानसिक दासना की भावना हैऔर उन्हें यह भी विचार करना होगा कि अब तक नारी परतंत्र है तो केवल अपने ही ऊपर अत्याचार करके। अत: अब नारी के उत्थान के लिए नारी को ही आगे आना होगा। तभी उनकी मुक्ति, सही मायनों में मुक्ति कहलायेगी अन्यथा यह मुक्ति भी पुरूषों द्वारा प्रदत्त होगी जो परतंत्रता का ही प्रदर्शन करेगी।