भगवान और विज्ञान
May 3, 2019 • RAVI SHANKAR JHA SUB EDITOR Sarvangin

                         भगवान और विज्ञान

विज्ञान और इश्वर को मानने वाले लोगो में हमेशा ही विवाद चलता रहा है वो शायद इसलिये की विज्ञान इश्वर के अस्तित्व को स्विकार नही कर पाई और ये बात इश्वर को मानने वाले लोग हजम नही कर पायें। मेरे को भी एक बार एक बच्चे ने प्रश्न पूछा कि क्या इश्वर है? मैने उसे जवाब दिया लेकिन वो तर्क करने लगा कि विज्ञान इश्वर के अस्तित्व को नही मानता तो मैं भी नही मानता। इस बच्चे के प्रश्न सुन कर मुझे एसा लगा की ये सवाल एक इसी बच्चे का नही है बल्कि ये सवाल आज के युवा का है जो इश्वर के अस्तित्व को नही समझ पा रहा मेरे हिसाब से विज्ञान में कही भी नास्तिकता की जगह नही है। विज्ञान खोज के आधार पर प्रमाणित तथ्यो के आधार पर बात करता है। लेकिन खोज भी तब शुरु होता है जब वैज्ञानिको के अंदर विचार पैदा हो। इसका मतलब न्यूटन को ये बात मालूम थी कि ग्रेविटेशन जैसी चीज है जेम्स वॉट को ये बात मालूम था कि रेल इंजन का अविश्कार हो सकता है। इन सब ने अपने अंदर के ज्ञान को जब प्रकृति में उपस्थित चीजो से जोड़ा तो नई चीजो का अविश्कार हुआ जिसके बारे में हम विज्ञान में पढ़ते है। विज्ञान ने कभी इश्वर के ना होने की बात कही नही वो तो इश्वर के होने के साक्ष्य की खोज मे प्रयास रत है। जिसमे 2012 का वर्ष इन विज्ञान के क्षेत्र में मील का पत्थर साबित हुआ।

ईश्वरीय कण की पुष्टि : वर्ष 2012 मे चार जुलाई को लार्ज हैड्रोन कोलाइडर के भौतिकशास्त्रियों का पांच दशक लम्बा प्रयोग उस समय अपनी परिणति पर पहुंच गया, जब उन्होंने ईश्वरीय कण के पाए जाने की घोषणा की। यह कण अन्य सभी उपपरमाण्विक तत्वों के लिए जिम्मेदार है, जैसे कि प्रोटान और इलेक्ट्रॉन, उनके द्रव्यमान। यह कण मानक मॉडल में अंतिम टुकड़ा भी है। यह सभी ज्ञात कणों और बलों की अंतरक्रिया की व्याख्या करने में सक्षम है। अमेरिका के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मानवीय इतिहास के इस सबसे महत्वपूर्ण प्रायोगिक सफलता के साथ अब कई नए आविष्कारों के लिए भी रास्ता साफ हो गया है।

लॉर्ड केल्विन 19वीं सदी के महान वैज्ञानिकों में गिने जाते हैं। वो एक धर्मनिष्ठ ईसाई थे, जिन्होंने अपने धर्म और विज्ञान में सामंजस्य बिठाने का तरीका ढूंढा लेकिन इसके लिए उन्हें डार्विन सहित अपने ज़माने के वैज्ञानिकों से संघर्ष करना पड़ा।

केल्विन पैमाने  के अलावा यांत्रिक यानी मैकनिकल ऊर्जा और गणित के क्षेत्र में उनका शोध यूरोप और अमरीका को जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाली ट्रांस अटलांटिक केबल को बिछाने में अहम साबित हुआ है। वो ब्रिटेन के पहले वैज्ञानिक थे जिन्हें हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में जगह मिली. उनका हमेशा ये विश्वास रहा कि उनकी आस्था से उन्हें बल मिला है और उनके वैज्ञानिक शोध को प्रेरणा मिली है।

"केल्विन बाइबल पढ़ते थे और रोज़ाना चर्च जाते थे।

जितनें भी वैज्ञानिक हुए औऱ उन्होने जितने खोज किये है वो सारा ज्ञान उनके अंदर ही था इससे ये साबित होता है कि जिस ईश्वर के साक्ष्य के होने की खोज हम बाहर कर रहे है वो हमारे अंदर है। दुनियां मे ज्यादातर वैज्ञानिक क्रिस्चन है और बाईबल में इश्वर के होने की जो व्याखा करी गई है वो ही इन वैज्ञानिको की कन्फियूजन का कारण है। लेकिन भारत की सनातन सभ्यता में इस बात का प्रमाण श्रीमद भगवद्गीता करती है की इश्वर हमारे हृदय में स्थित है। जो हमारें शरीर रुपी यंत्र को हमारे कर्मों के अनुसार चलाता है। हम जिस ईश्वर को बाहर देखना चाहते है वो तो हमरे अंदर ही है लेकिन हम ने अपनी दृष्टि को अंदर की बजाये बाहर जमा रखा है तभी वो इश्वर हमें नजर नही आता है।

कैसे जाने की इश्वर है?

इश्वर के जानने के लिये श्री मद भगवद्गीता में पांच तत्व ज्ञान (knowledge), एश्वर्य (Money) ,शक्ति (Physical power ), बल (Power of Organization)  ,वीर्य (Creation Power), तेज (Impact) बताये गये है और इन सब की कमना दुनिया का हर आदमी चाहता है जो इन तत्वो का विकास अपनें अंदर कर पाता है वो ही ईश्वर का साक्षात्कार कर पाता है। लेकिन ये कोई एक दिन का ज्ञान नही की आज हम सोचे की  ईश्वर से मिलना है औऱ वो हमें मिल जायेगा हमें सतत प्रयास औऱ सद मार्ग पर निरंतर सतत प्रयास करते हूये कर्मयोग का आचरण करना होगा विज्ञान भी जब इस दृष्टि से आगे बढ़ा है तो ये समक्ष पाया है कोई तो सत्ता है जो सृष्टि का संतुलन बनाये रखने के लिये खाद्य चक्र प्रयावर्ण चक्र मौसम चक्र का निर्माण किया है। विज्ञान ये समझ  पाया  कोई तो सत्ता तो है जो इंसान के शरिर का निर्माण मॉ के शरीर में करता है औऱ फिर उसके शरीर मे एक दिन जान फूंकता है।