मादा भ्रूण हत्या के पीछे अमीरी ?
April 16, 2019 • डॉ. इंदिरा मिश्रा

                                            मादा भ्रूण हत्या के पीछे अमीरी ?

                                   

भ्रूण हत्या के लिये लड़के की चाह को  एक जायज कारण माना जाता है, खासतौर से जहां पहले लड़की हो चुकी है और अब दूसरा या तीसरा बच्चा मतलब लड़का ही चाहिए। हालांकि आज इस बात को नकारा जा रहा है कि हमारे समाज में बालिकाओं को अहमियत नहीं दी जा रही है। एक तथ्य जो एडुकेशन फॉरम फॉर वूमन जस्टिस एण्ड सोशियल वेलफेयर के अनुभव को दर्शाता है कि आज मुद्दा इस बात तक सीमित नहीं है कि समाज में लड़कों के प्रति ज्यादा मोह है परंतु जानबूझ कर मादा भ्रूण को जन्म से पूर्व मार डालने की प्रथा प्रारंभ हो गई है। आश्चर्य की बात तो यह है कि मादा भ्रूण हत्या के पीछे गरीबी से ज्यादा आर्थिक संपन्नता का हाथ हैं।

लड़कियों को अपने मायके में किसी और की अमानत और ससुराल में अस्थायी सदस्य के रूप में देखा जाता है। इससे भी अधिक लड़कियों को जीवन भर के लिए आर्थिक बोझ समझा जाता है। हमारे यहाँ किसी भी सामाजिक-आर्थिक वर्ग का यह रवैया बन  गया है। देश भर में जन्म के समय लिंगानुपात में कथित गिरावट पर चिंता जताते हुए जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने महिला एवं बाल विकास (WCD) मंत्रालय समेत सभी राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों से इस मुद्दे पर विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की स्थिति के बारे में रिपोर्ट तलब की तो आकड़े चौकाने वाले थे।

भारतीय महापंजीयक कार्यालय द्वारा सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम्स (CRS) से जुटाए गए आंकड़ों से खुलासा होता है कि 2016 में आंध्र प्रदेश और राजस्थान में जन्म के समय लड़कों और लड़कियों का अनुपात 1000 पर 806 रहा। 

तमिलनाडु में 2007 में यह अनुपात प्रति 1000 पर 935 था जो 2016 में घटकर 840 हो गया। अखिल भारतीय स्तर पर यह अनुपात 1000 पर 877 था। कर्नाटक में यह अनुपात प्रति 1000 पर 1004 से घटकर 896 हो गया तथा तेलंगाना में यह प्रति 1000 पर 881 रहा। 

आखिर इस समस्या की जड़ क्या है?  यहाँ तक कि परंपरागत दहेज प्रथा भी एक सहज और व्यावसायिक लेन-देन का रूप ले चुकी है। जहाँ विवाह के साथ ही लड़की पक्ष को कभी न खत्म होने वाले ‘उपहार' वर पक्ष को समयानुसार रीतिरवाजों के आधार पर मुहैया कराने पड़ते हैं। फिर भी इसकी कोई गारंटी नहीं कि नवविवाहिता को संताया नहीं जाएगा। हालांकि कोई प्रत्यक्ष मांग नहीं की जाती परंतु लड़की को जमीन पर न सोना पड़े इसलिए माँ-बाप उसे पलंग देते हैं। अगर वह गर्भ धारण करने में असमर्थ होती है, तो उसे ताने सुनने पड़ते हैं। जब वह गर्भ धारण करती है, तो उसका सारा डॉक्टरी खर्च, निजी अस्पताल में मायके वालों को ही उठाना पड़ता है। उस पर यदि लड़के के बजाय लड़की पैदा हो जाती है तो उसे जीवन भर के लिए मायके में छोड़ दिया जाता है, और पति दूसरी शादी कर लेता है। जीवन भर लड़की इसी तरह सताई जाती है। इस माहौल में कोई भी परिवार लड़की को क्यों जन्म देना चाहेगा? आज विज्ञान इतनी प्रगति कर . चुका है कि जन्म लेने से पूर्व ही लिंग परीक्षण करके लड़कियों को गर्भ में ही मार डाला जाता है, इस प्रक्रिया का कारण न केवल परिवार को अपनी गलती के अहसास से दूर रखती है, बल्कि उन्हें लडका चुनने का मौका भी देती है। कन्या भ्रूण हत्या को महज एक डॉक्टरी प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है। यह चलन जितना समृद्ध क्षेत्र बनाएगा, लड़कियों के लिए उतना ही अधिक खतरा होगा।  यह उदाहरण इस बात को दर्शाता है कि आर्थिक सशक्तिकरण के मुद्दे से जूझने के लिए महिलाओं ने समूह बनाए, जिन्हें स्वयं सहायता समूह' कहा गया। आज यही आर्थिक समृद्धि महिलाओं की कमजोरी का कारण बन चुका है। महिलाएँ समूह से पैसा उधार लेकर अल्ट्रासाउंड करवाती हैं, और मादा भ्रूण की पुष्टि होने पर गर्भपात करवा लेती हैं।  

समय की यह मांग है कि कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के . लिए बहुस्तरीय आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक रणनीति अपनाने की जरूरत है। इससे पहले कि लड़कियाँ विलुप्त हैजाएं, समाज को नारी की अहमियत को समझते हुए, ए होकर मादा भ्रण हत्या के खिलाफ दृढ़तापर्वक लड़ना होगा।