विवाह व् दोस्ती जैसे पवित्र रिश्तों का पाखण्ड एवं गिरते सामाजिक मूल्य बन रहे हैं वेश्यावृति के आधार
April 21, 2019 • डॉ. इंदिरा मिश्रा ,सम्पादिका सर्वांगीण

 

 

वेश्या और समाज के रिश्ते में आई तब्दीलियों पर एक निगाह डालनी चाहिए। वेश्या जो अनिवार्यतः एक असामाजिक तत्त्व समझी जाती थी, आज विभिन्न सामाजिक शक्तियों द्वारा हमदर्दी की नजर में देखी जा रही हैं। उसके पास अपनी कहानी है, जिसे वह किसी कलाकार, साहित्यकार या समाज सुधारक की मध्यस्थता के बिना अपने शब्दों में सुना रही हैं और जमाना पहली बार ध्यान से सुन रहा है

 

शी- खुशी कर दे विदा कि रानी बेटी राज जुकरेगी।' बिहार के सीमावर्ती इलाके के गरीब परिवारों के लोग अपनी रानी बेटियों को भी ही सोच कर विदा करते हैं, लेकिन उनमें से आधी भी अपने पिता के घर अपने सुख-दुख सुनाने नहीं आ पाती हैं। उनका क्या हाल है? कैसी हैं ? कहां हैं? दुनिया में हैं भी या नहीं ? यह पता लगाने की न तो माता-पिता की कबत होती है और न ही कहीं से सहयोग की उम्मीद। अधिकतर परिवार दो जून की रोटी जुटा पाने में भी असमर्थ होते हैं, साक्षरता और विकास जैसी बातों से उनका दर-दूर तक वास्ता नहींइस इलाके के परिवारों को अब तक यही पता है कि बच्चे भगवान की देन हैं, हम पैदा होने से नहीं रोक सकते। उनकी सोच है कि बेटी की पैदाइश ही होती है, विवाह के लिए। उसके बाद उसका भाग्य जाने।

 हालांकि ऐसी सोच रखने वाले वेश्यावृत्ति में परिवारों में भी अब बेटियों के भविष्य रही बालिकाओं चिंता सताने लगी है। लेकिन कलेजे पहले सिर्फ टुकड़े से दुबारा मिल पाने की चाहत है कंगा किसी-किसी की ही पूरी होती है। उत्तर बिहार और उत्तर बंगाल के था। वहीं अब बीच कोसी-महानंदा क्षेत्र की अधिकतर रहन-सहन बालिकाएं शादी के बाद कहीं गुम हो गई कहीं गुम हो गई और नौकरी और नाकरा , खासकर वे जिनकी शादी बिचौलियों नाम पर दलालों) ने कराई थी। जोगबनी की जाता एक अनुसूचित जनजाति की महिला गोपसी ने वहां के पुलिस अधीक्षक के समक्ष आवेदन दिया है कि उसकी बेटी कलावती को चार साल पहले गांव की एक महिला साथ ले गई थी। अब उसका सही- सही पता ठिकाना नहीं बताती है। कहती है उत्तर प्रदेश के एक अमीर घराने में ब्याह दी गई है। तो दूसरी तरफ गांव के ही एक व्यक्ति के द्वारा लड़का बताने पर अपनी बेटी का जांघ दान (बाल-विवाह) कर खुश होने वाली किशनगंज की दौलती की बेटी सात साल बाद भी मायके नहीं लौटी है। दौलती बेटी से मिलना तो चाहती है, लेकिन उसे नहीं पता कि जो व्यक्ति ब्याह कर ले गया था वो अब कहां है। कोसी-महानंदा के इस क्षेत्र में एक-दो नहीं हजारों बेटियां ऐसी हैं जो शादी के बाद घर लौटी ही नहीं। लेकिन इसे मुद्दा बनाने वाला कोई नहीं है। न तो सरकार ने स्थानीय प्रशासन और न ही कोई राजनीतिक दल। अब तक छोटी-छोटी बातों को अहम मुद्दा बनाकर तूफान खड़ा करने वाली पार्टियां हजारों बेटियों का गुम हो जाना, बाल-विवाह होना, क्षेत्र में निर्धनता, यहां तक कि दो जून की रोटी के लिए अधेड़ उम्र के व्यक्ति से बालब्याह कर देने को विवश परिवारों के दर्द से व्यथित नहीं होतीं।

किसी राजनीतिक पार्टी या सरकार ने तो नहीं  सुध ली है। अपने मतलब के लिए ही सही कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं गए सर्वेक्षण की रिपोर्ट जो हालात बयां करती है वह कम दर्दनाक नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जो बच्चियां किसी तरह लौट कर वापस आ पाई हैं, उनमें से 50-80 फीसदी ने बताया कि उनसे वेश्यावृत्ति कराई जाती थी, जिसके सूत्रधार उसके ससुराल वाले होते थे। कुछ लड़कियों ने तो यह भी स्वीकार किया कि ब्याह कर ले जाने वाला व्यक्ति ही उनसे धंधा करवाता था और उसी आमदनी से उसका खर्चा चलता था। वैसे वेश्यावृत्ति में झोंकी जा रही बालिकाओं को पहले सिर्फ ब्याह के नाम पर ही फंसाया जाता था। वहीं अब उन्हें अच्छा रहन-सहन सिखाने और नौकरी कराने के नाम पर ले जाया जाता है। महज आठ साल की उम्र में देह व्यापार की बारीकियों को साख कर गांव लौटी गडिया कहती है. ''छह महीना पहले जब वह गई थी तो दीदी (जो ले गई थी) ने पहले दूसरी लड़कियों लड़कियों को काम करते दिखाया, फिर हफ्ते भर बाद हमको भी सुलाने लगी। बदले में कपड़ा और खाना देती इस धंधे में आने के बाद भी तन पर भरपूर कपड़ा और हर रोज पेट भर खाना नसीब नहीं हो पाता। स्वास्थ्य जांच के बारे में तो सोच भी नहीं सकती। गंभीर रूप से बीमार पड़ी तो रोड पर भीख मांगने को उतर पड़ती हैं। इस इलाके के लोगों के लिए तो सामाजिक, आर्थिक और प्राकृतिक हर तरह की मजबूरियां हैं, जो उन्हें बच्चियों के ट्रेफिकिंग से नहीं रोक पा रही हैं। लेकिन फिर भी कुछ सवाल हमेशा अनुत्तरित रह जाते हैं, कि सरकार की क्या विवशता है, जो इस इलाके में आज भी आदिमयुग की जिंदगी है।  बेटियां दो जून की रोटी के लिए बिक रही हैं।

वेश्यावृत्ति में झोंकी जा रही बालिकाओं को पहले सिर्फ ब्याह के नाम है कंगा जाना था। वहीं अब उन्हें अच्छा 'रहन-सहन सिखाने और नौकरी कराने के और नाकरा कराने के नाम पर ले जाया जाता है।बेचने का धंधा तेजी से मित्रता क्लयों और डेटिंग एजेंसियों की शक्ल ग्रहण करता जा रहा है। अखबार फ्रेंडशिप क्लबों और डेटिंग को सुविधाजनक बनाने वाले विज्ञापनों से भरे रहते हैं। पुराने ढंग कीवेश्यावृत्ति के मुकाबले यह एकदम नयी बात है। इनके तहत लोग केवल यौनक्रिया के लिए ही नहीं मिलते, बल्कि साथ-साथ घूमते हैं, बातें करते हैं, तोहफे खरीदे और दिए जाते हैं, मामला एक दिन या कछ घंटों या एक रात तक ही नहीं, बल्कि कई दिन तक चलता है। इस प्रक्रिया में एक तरह की अंतरंगता होने की क्षीण सी संभावना रहती है। एक तरफ यौन-कम होने का दावा और दूसरी तरफ देह के सौदे को मित्रता में तब्दील करने की कोशिश बताता हैं कि

भारतीय समाज आधुनिकीकरण के एक ऐसे खास दौर में पहुंच गया है, जिसमें कृपाल अंतरंग रिश्तों का संसार विक्टोरियायुगोनवर्जनाओं की बुनियाद पर टिका नहीं रह सकता। यह एक ऐसा दौर है, जिसमें रोज सेक्स मैनुअल की किश्तें वैज्ञानिक अंदाज में पाठकों और श्रोताओं के लिए पेश कर रहा है। आज आवश्यकता है परिवार के  ढहते  सामाजिक मूल्यों एवं प्रतिमानों को बचाने की ताकि रिश्तों के आड़ में बच्चियों को वेश्यावृति की आग में जबरन न  झोंका जाए।