आदिकाल से ही नारी की निर्णायक भूमिका…धर्म हो या युद्ध
November 17, 2019 • Sarvangin डॉ. इन्दिरा मिश्रा

वैदिक काल से ही धर्म की अभिव्यक्ति यज्ञ के माध्यम से होती है और इस यज्ञ में पति-पत्नी दोनों के सम्मिलित होने की अनिवार्यता थी। स्त्रियों का उपनयन संस्कार होता था और वे सन्ध्या विधि भी सम्पन्न करती थीं। क्षत्रिय कन्याओं को युद्धाभ्यास और ब्राह्मण कन्याओं को वेदाभ्यास कराया जाता था वाल्मीकि के आश्रम में आत्रेयी राम के पुत्र लव और कुश के साथ पढ़ा करती थी। भारत की मूर्तियों में अश्वारोही लड़कियों की सेना का चित्रण मिलता है। पतंजलि ने भाला चलाने वाली महिलाओं (शक्तिकी) का वर्णन किया है। कौटिल्य ने महिला धनुर्धरों का भी उल्लेख किया है। यानी धर्म और युद्ध दोनों में स्त्री की भूमिका समान थी। पुरुषों का प्रभुत्व स्वाभाविक नहीं था और न ही चिरस्थायी। अनेक ऐसे युग रहे हैं जिसमें पुरुषों का प्रभुत्व उतना सुनिश्चित नहीं था जितना हम अज्ञानतावश मान लेते हैं नारी मूलतः पुरुष की शिक्षक होती है, तब भी जब वह शिशु होता है और तब भी जब वह वयस्क हो जाता है 'ऐतरेय ब्राह्मण' में कहा गया है- “क्योंकि पिता फिर अपनी पत्नी से उत्पन्न होता ' (जायते पुनः) इसलिए वह जाया कहलाती है। वह उसकी दूसरी माता है। समाज में युद्ध और शान्ति के बीच सन्तुलन का दायित्व स्त्री ने ही संभाल रखा था परन्तु बीच में परिस्थितियाँ बदलीं। पाशविक और हिंसक प्रवृत्तियों का बोलबाला हुआ और स्त्री चुपचाप हाशिए पर आ गई। पुरुष वर्चस्व वाले समाज का स्वरूप निहारती। कई युद्धों, महायुद्धों की विभीषिका झेलते समाज का स्वरूप। परन्तु धर्म और युद्ध केवल उसी सीमा तक उचित है, जहाँ तक मानव कल्याण उनका लक्ष्य है। पुलिस द्वारा समाज में शान्ति स्थापना हेतु बलप्रयोग बुरा नहीं कहा जा सकता। बलप्रयोग कापरिस्थितियों से अलग करके अच्छा या बुरा नहीं कह सकते चाकू किसी चिकित्सक द्वारा रोगी के ऑपरेशन में प्रयुक्त है अथवा लूटपाट की नीयत से किसी की  जान लेने के लिए, दोनों में अन्तर है। धर्म का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि हम कायर हो जाएँ। भगवद्गीता' में अर्जुन को 'स्वधर्म' की शिक्षा  दी गई है। एक योद्धा सेनापति ने बुद्ध से पूछा-"क्या अपने घर-बार की रक्षा के लिए युद्ध करना बुरा है? तो बद्ध ने उत्तर दिया-"जो दण्ड का पात्र है उसे दण्ड जो लोग शान्ति बनाए रखने का कोई उपाय शेष न रहने पर धर्म के लिए युद्ध करते हैं, वे दोषी हैं। हिन्दू शास्त्र अहिंसा को सर्वोच्च कर्त्तव्य मानकर चलते हैं परन्तु ऐसे भी अवसरों के संकेत उनमें उल्लिखित हैं जहाँ हम अहिंसा के मार्ग से विचलित होते हैं और विचलन सामाजिक अनुशासन के लिए आवश्यक भी है परन्तु धीरे-धीरे युद्ध का स्वरूप भी बदला और का लक्ष्य शान्ति स्थापना न रहकर स्वयं में युद्ध ही लक्ष्य बन गया। एक उत्तेजनामय खेल, पूंजीपतियों का निहित स्वार्थ जिसमें आक्रमण के लिए बर्बर अस्त्रों का प्रयोग होता है। समाज के उन वर्गों को यन्त्रणा अधिक भुगतनी होती है जिनके कन्धों पर इस युद्ध की कोई जिम्मेदारी नहीं होती है या वे इसके लिए थोडा भी उत्तरदायी नहीं होते हैं। स्त्रियों और बच्चों पर कत्ले आम का कहर टूट पड़ता है। अपने शत्रु के लिए घृणा और का कहर टूट पड़ता है अपने शव हिंसा लगातार राष्ट्रों को पाशविक बनाती जा रही है। चकमक पत्थर से बारूद तक और अब बारूद से विषैली गैसों एवं जैविक हथियारों तक बढ़ आई है पाशविकता। स्त्री ही इस क्रुरता ओर पशुता वाले व्यवहार को नियन्त्रित कर सकती है। नारी हर स्वरूप में माँ है। वही रोक सकती है अपने योद्धा और दिग्भ्रमित सन्तानों को। अपने अन्तर के चारू गुणों को अपनी सन्तानों में स्थानान्तरित करके ही वह मानवता के विनाश को रोक सकती है। वही समझा सकती है कि धर्म आत्मानुशासन और आत्मोत्थान के लिए है, झूठे प्रचार-प्रसार के लिए नहीं। जब अँधेरे में हम बिल्कुल अकेले होते है जहाँ प्रकाश की कोई किरण नहीं दिखाई पड़ती, सब ओर कठिनाइयाँ ही कठिनाइयाँ होती हैं तब हम अपने आपको किसी प्रेममयी नारी के हाथ में छोड़ देते हैं और वह जाया ही होती है।