बालिका और समाज
November 16, 2019 • Sarvangin रंजना झा

समाज में बेटियों के प्रति आज भी कहीं न कहीं विसंगतियां तया पर-जैसे बेटियों मिल को जन्म से ही श्रापित होने के लिए छोड़ दिया गया है। कदम कदम पर बेटियों को एहसास कराना कि तुम बेटी हो यह काम । तुम्हारा है बेटियों को निर्णय लेने का भी अधिकार नहीं होता है।बेटी ।आधकार नहीं होता है। बेटी समाज की कठपुतली होती नजर आती है कभी वह तरह तरह के ताने । ह कभा वह तरह तरह के ताने सुनने को विवश होती है। घर की जिम्मेदारी भी सबसे ज्यादा बेटियों दा बेटियों को ही दी जाती है। दूसरी तरफ संस्था,संगठन, या फिर सरकार उनकी तरफ से 1 या फिर सरकार उनकी तरफ से हजारो योजनायें बनती है। कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं जिसमें केवल 5% ही बेटियाँ लाभान्वित हो पाती हैं बाकी 95% आज भी बेटियाँ उपेक्षित या भेंट की बलि चढ़ जाती हैं। 

बेटा बेटी में भेद भाव आज से नहीं प्राचीन काल से चली आ रही हैं राजस्थान,हरियाणा में तो जन्म से पहले बेटियों को गर्भ में मार दिया जाता है जिसका खामियाजा यह है कि वहाँ लड़कों की शादी के लिए लड़की मिलना मुश्किल हो रहा है। सरकार भी 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसी योजना लागू कर कन्या भ्रूण हत्या जैसी घटनायें कम करने की कोशिश रही है। लेकिन यह काफी नहीं है जब तक देश का हर नागरिक अपनी सोच में बदलाव नहीं लायेगा तब तक बेटी को सही मायने में इंसाफ नहीं मिल पायेगा।। बेटियों की सुरक्षा को लेकर घर,समाज यहाँ तक की सरकार को सोचना पडता है। ऐसी नौबत ही क्यों आती है कि बेटी है तो सुरक्षा की जरूरत है क्यों हम बेटियों की तरफ बुरी नजर से ही देखते हैं बेटों को क्यों नहीं संस्कार देते कि चलते राह बहु, बेटियों पर गलत नजर मत रखो अगर यह मानसिकता बदल जाए तो बेटियों के लिए समाज में बोझ और अगल से सुरक्षा की जरूरत नहीं पड़गी। लिंग का भेद न हो तो बेटियों के नाम जितनी भी संस्थाएँ बनी हैं वह सामान्य संस्था की श्रेणी में आ जाएगा और बेटियों के नाम चलने वाली योजना वह आम नागरिक की तरह सामान्य रूप से चलने लगेगी जरूरत है समाज को कंधे से कंधा मिला कर चलने की! देश की बेटी को भीख नहीं अधिकार और सम्मान चाहिए। हमारी न्याय पालिका भी बेटियों पर पूर्ण न्याय नहीं कर पाती है कहीं कहीं तो महिलाओं पर झूठे आरोप लगा दिए जाते हैं और साबित कर दिया जाता है कि यह ता कर दिया जाता है कि यह तो बदचलन थी जिसका न्याय उसे नहीं मिल पाता और समाज में उसे लोग घूरते तथा उसका गलत इस्तेमाल करते हैं। । सरकार योजनाएँ निकालती है लेकिन वह लागू होने में वर्षो लगाती है। संसद में माहला लगाती है। संसद में महिला की सीट आरक्षित होने की बात चली थी कि 33% महिलाओं क लिए कि 33% महिलाओं के लिए आरक्षित किया जाएगा लेकिन अभी तक राज्यसभा से बिल पास नहीं हुआ हप राज्यसभा से बिल पास नहीं हआ है वह लम्बित है। तीन तलाक का मामला भी इसी तरह तरह लटका दिया गया है। कहीं न कहीं महिलाओं के प्रति कुछ पुरूष आज भा अहका के प्रति कुछ पुरूष आज भी अहंकार और ओछी मानसिकता रखते हैं। युनिसेफ के अनुसार 10 महिलाएं विश्व जनसंख्या से लुप्त हो चकी हैं।

भारत एवं संयुक्त राष्ट्रसंघ भी बेटियों की हो रही कमी से चिंतित है। भारत सरकार द्वारा देशभर में 24जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र ने 11 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मनाए जाने की घोषणा वर्ष 2012 में की। बच्चियों के प्रति समाज में जागरूकता और चेतना पैदा करने के लिए यह दिवस प्रति वर्ष मनाया जाता है। इन दिवस को मनाने का उद्देश्य है कि समाज में हर बालिका का सम्मान हो, उसका भी महत्व हो और उसके साथ बराबरी का व्यवहार किया जाए। 1991 की जनगणना के अनुसार, भारत में लड़कियों की संख्या (0-6 आयु वर्ग की) 1000 लड़कों पर 945 थी। 2001 की जनगणना के दौरान ये घटकर 1000 लड़कों पर 927 लड़कियाँ और 2011 में 1000 लड़कों पर 918 लड़कियाँ हो गई थी। इस सन्दर्भ में, भारत को 2012 में, यूनीसेफ द्वारा 195 देशों में से 41वाँ स्थान दिया गया था। लडकियों की संख्या में इतनी बड़ी गिरावट देश में महिला सशक्तिकरण की कमी का सूचक है। लड़कियों की संख्या में भारी कमी के मुख्य कारण जन्म से पर्व भेदभाव चयनात्मक लिंग आधारित परीक्षण, लैंगिक असमानता, महिलाओं के खिलाफ अत्याचार आदि सामाजिक मुद्दे हैं। इस योजना को शुरु करने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोगों से कन्या भ्रूण हत्या का उन्मूलन करने और बेटियों की भलाई के लिए बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना का अनुसरण करने को कहा। ये कार्यक्रम पी.एम. मोदी द्वारा 22 जनवरी 2015 को शुरु किया गया था। य सर्वप्रथम पानीपत, हरियाणा में शरु किया गया था। देश में लड़किया। की निरंतर कम होती लैंगिक प्रवृति ने इस कार्यक्रम को शुरु करना बहुत आवश्यक बना दिया था। इस योजना के उद्देश्य हैं: बेटियों के जीवन की रक्षा, सुरक्षा और उच्च शिक्षा को सुनिश्चित करना। पता, सुरक्षा आर उच्च शिक्षा को सुनिश्चित करना। ॥ कायक्षत्रा में समान भागीदारी के माध्यम से महिला सशक्तिकरण को सुनिश्चित करना। मानक पराक्षण का उन्मूलन करके बेटियों की रक्षा करना। पुरे भारत में कन्याओं के स्तर को ऊँचा उठाना, विशेषतः 100 प्रमुख चुने गए जिलों में (जिनकी सी.एस.आर. कम है)। लड़कियों के कल्याण के लिए एक साथ काम करने के लिए स्वास्थ्य एव पा एंव परिवार कल्याण मंत्रालय, महिला एंव बाल विकास मंत्रालय और मानव संसाधन विकास मंत्रालय को एक साथ लाना। सरकार ही नहीं हम सभी को समाज में रहने वाले हर वर्ग को अपनी मानसिकता में बदलाव लाने की जरूरत है क्योंकि समाज में बेटी नहीं तो आने वाला कल देश की धरोहर को खत्म खत्म कर देगी । ___ 'बेटी है तो देश समाज और परिवार की शान है।