जेण्डर बजटिंग महिला सशक्तिकरण की महत्वपूर्ण कड़ी
February 10, 2020 • डॉ. इन्दिरा मिश्रा Sarvangin

साभार: सिद्धार्थ, सर्वांगीण

समाज के विकास एवं निर्माण में महिला और पुरूष दोंनों की अत्यंत आवश्यक है। महिला व पुरूष को समाज रूपी गाड़ी के दो पहिए के समान माना गया है। अतः समाज के विकास एवं निर्माण के लिए महिला एवं पुरूष की परस्पर सहभागिता व साझेदारी अनिवार्य होती है। सर्व विदित है कि दुनिया के पटल पर लगभग दो-तीन दशकों में लैंगिक यानी जेण्डर बजट की अवधारणा उभरकर आई है। इसके माध्यम से राष्ट्र-राज्य का प्रयास होता है कि किसी भी सरकारी योजना के लाभ को महिलाओं तक इस तरह पहंचाया जाय ताकि लैंगिक तौर पर पुरुषों और महिलाओं के बीच जो विकास की खाई बनी हुई है उसे पाटा जा सके। महिलाओं को बेहतर जीवनस्तर उपलब्ध कराने के लिए प्रयास किया जाता है ताकि सामाजिक तौर पर पुरूषों की तुलना में पीछे न छूटें। यह संकल्पनात्मक रूप से महिला सशक्तिकरण का ही विस्तार रूप है, जिसमें महिलाओं के विकास को स्वतंत्र रूप से न देखकर पुरूषों के बराबर पहुंचाने की कोशिश की जाती है।भारतीय संविधान में उल्लेख किया गया है कि देश में जाति धर्म, लिंग, सम्प्रदाय, आदि के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा, किन्तु क्या ऐसा किया जा रहा है? शायद नहीं , किन्तु समाज आज भी उन्हें दोयम दर्जे की नजर से देखता है क्या कोई समाज जहाँ पुरूष और महिला में भेदभाव किया जाता है इसलिए महिलाओं के सशक्तिकरण की आवश्यकता है।

लैंगिक असमानता के कारण

प्रसिद्ध समाजशास्त्री सिल्विया वाल्बे के अनुसार, “पितृसत्ता सामाजिक संरचना की ऐसी व्यवस्था हैं, जिसमें पुरुष, महिला पर अपना प्रभुत्व जमाता है, उसका दमन करता है और उसका शोषण करता है” और भारतीय समाज में लिंग असमानता का मूल कारण इसी पितृसत्तात्मक व्यवस्था में निहित है।महिलाओं का शोषण भारतीय समाज की सदियों पुरानी सांस्कृतिक परिघटना है। पितृसत्तात्मक  व्यवस्था ने अपनी वैधता और स्वीकृति हमारे धार्मिक विश्वासों, चाहे वो हिन्दू, मुस्लिम या किसी अन्य धर्म से ही क्यों न हों, सबसे प्राप्त की है। समाज में महिलाओं की निम्न स्थिति होने के कुछ कारणों में अत्यधिक गरीबी और शिक्षा की कमी भी हैं। गरीबी और शिक्षा की कमी के कारण बहुत सी महिलाएँ कम वेतन पर घरेलू कार्य करने, वैश्यावृत्ति करने या प्रवासी मज़दूरों के रूप में कार्य करने के लिये मजबूर हो जाती हैं। महिलाओं को न केवल असमान वेतन दिया जाता हैं, बल्कि उनके लिये कम कौशल की नौकरियाँ पेश की जाती हैं जिनका वेतनमान बहुत कम होता हैं। यह लिंग के आधार पर असमानता का एक प्रमुख रूप बन गया है।

लड़की को बचपन से शिक्षित करना अभी भी एक बुरा निवेश माना जाता हैं क्योंकि एक दिन उसकी शादी होगी और उसे पिता के घर को छोड़कर दूसरे घर जाना पड़ेगा। इसलिये, अच्छी शिक्षा के अभाव में अधिकांश महिलाएँ वर्तमान में नौकरी के लिये आवश्यक कौशल की शर्तों को पूरा करने में असक्षम हो जाती हैं। महिलाओं को खाने के लिये वही मिलता है जो परिवार के पुरुषों के खाने के बाद बच जाता है। अतः समुचित और पौष्टिक भोजन के अभाव में महिलाएँ कई तरह के रोगों का शिकार हो जाती हैं।

महिला सशक्तिकरण का अर्थ :

अत्यन्त सरल शब्दों में महिला सशक्तिकरण का अर्थ है- महिलाओं को शक्तिशाली बनाना। इसका तात्पर्य यह है कि महिलाएँ समाज में शक्तिहीन है इसलिए इन्हें शक्तिशाली बनाना। भारतीय संदर्भ में महिलाओं को पुरूषों की बराबरी पर लाना।

जेण्डर और लिंग :

'जेण्डर' शब्द के अर्थ में महिलाओं एवं पुरूषों, बालकों एवं बालिकाओं की सांस्कृतिक एवं सामाजिक स्तर पर निर्धारित भूमिकाएं, दायित्व विकास अधिकार, संबंध एवं अपेक्षाएं शामिल है जो समय एवं स्थान के अनुसार परिवर्तनशील है। परिवर्तनशील 'लिंग' शब्द मानव जाति के नर एवं मादा के जैविक भेद का सूचक है। किसी भी व्यक्ति के पूरे जीवनकाल में समय और स्थान के आधार पर परिवर्तनशील नहीं होता है।

जेण्डर बजटिंग क्या है? :

वार्षिक बजट में महिलाओं और बालिकाओं के विकास के लिए आबंटित बजट के प्रावधान और खर्च पर समीक्षा करना जेण्डर बजटिंग कहलाता है, इसमें महिलाओं के लिए अलग से बजट का निर्माण नहीं किया जाता लेकिन आम बजट में महिलाओं और बालिकाओं पर हुए व्यय का ऑडिट की समीक्षा की जाती है। किन्तु जेण्डर प्रतिसंवेदी बजट, जेण्डर संवेदी बजट और महिलाओं का बजट इन शब्दों का उपयोग प्रायः एक दूसरे के लिए किया जाता है। जेण्डर बजट का मतलब यह नहीं है कि महिलाओं के लिए अलग से बजट पेश किया जाये, बल्कि मुख्य बजट में ही कुछ ऐसी व्यवस्था की जाय ताकि सामाजिक-लैंगिक दरार को भरने के लिए मदद मिल सके। सरकारी पैसों को किस मद में कितना खर्च किया जाय और कहां से पैसा जमा किया जाये बजट में मुख्यतः यही काम होते हैं। ठीक उसी प्रकार जैसे किसी परिवार में मासिक एवं वार्षिक आय-व्यय का लेखा-जोखा रखा जाता है। इस आय एवं व्यय का सरकार इस प्रकार बंटवारा करती है, ताकि उसके लाभ से सामाजिक विकास में पीछे छूटती आधी जनसंख्या  को मदद पहुंच सके, तो उसे संवेदनशील बजट कहते है. इसमें वंचित, कमजोर, और बेसहारा महिलाओं पर ज्यादा जोर होता है।

जेण्डर बजटिंग की आवश्यकता :

जेण्डर आधारित बजट एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा बजट बनाने की प्रक्रिया में जेण्डर समानता को बढ़ावा देने वाले विश्लेषणों के आधार पर सार्वजनिक संसाधनों का निर्धारण किया जाता है। जेण्डर आधारित बजट सरकारी कर्मचारियों को इस । जेण्डर आधारित बजट महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग बजट बनाने की बात नहीं करता है, बल्कि यह सरकार में मुख्यधारा के बजट के  आधार पर महिलाओं और पुरूषों पर पड़ने वाले प्रभावों को अलग-अलग दिखाने का एक प्रयास है।

जेण्डर बजटिंग के लिए प्रयास :

 विश्वस्तर पर महिलाओं की स्थिति सुधारने और जेण्डर समानता को सुनिश्चित करने के लिए अनेक पहल की गई है। महिलाओं के प्रति विभेदों को समाप्त करने के लिए 18 दिसम्बर 1979 को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा (Convention of All Forms of Discrimination Against Women) को अपनाया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1946 में गठित महिलाओं की स्थिति पर आयोग के तीस वर्ष से अधिक अवधि के अथक प्रयासों का प्रतिफल है। इस आयोग का उद्देश्य यह था कि विश्व की आधी आबादी , यानी महिलाओं को, उनके बुनियादी मानवाधिकार, गरिमा एवं मान, पुरूषों के समान ही बराबरी से दिलाया जा सके। प्रयोगिक तौर पर सर्वप्रथम इसकी शुरूआत आस्ट्रेलिया में मानी जाती है, जहां पर 1980 के दशक में पहली बार इसका प्रयोग किया गया। ब्रिटेन में 1989 में महिलाओं के हित में बजट को लेकर एक स्वतंत्र समूह का गठन किया गया जिसमे मजदूर संगठनों व नगर समाज के प्रतिनिधि एवं बौद्धिक वर्ग के सदस्य होते थे और उसका ब्रिटिश सरकार के साथ 1997 में बनी लेबर दल के सरकार के साथ निरन्तर सपर्क रहता था। वर्तमान में दुनिया में करीब 70 देश ऐसे है जहां पर जेण्डर बजट के प्रयोग हो रहे है। भारत में पहले वंचित वर्गों की तरह महिलाओं के कल्याण की दृष्टि से ही बजट का प्रावधान होते थे। 1990 में नई आर्थिक नीति की पृष्ठभूमि और भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों में अपने हितों के  बजट देखने की दृष्टि और कल्याण का स्थान सशक्तिकरण ने ले लिया। पंचवर्षीय योजना में केवल एक विभाग महिला व बाल विकास विभाग के तहत प्रयास शुरू हुए। 1990 में संसद के द्वारा पारित एक कानून के माध्यम से राष्ट्रीय महिला आयोग का गठन किया गया। 9वीं पंचवर्षीय योजना में इस पर जोर देते हुए 30 प्रतिशत राशि या बजट के लाभ को महिलाओं को देने की योजना पर काम किया गया। 10 वीं योजना में बजट दस्तावेजों में महिलाओं के विकास के लिए वित्तीय प्रावधान करके जेण्डर बजट को बढ़ावा दिया गया है। इस तरह भारत औपचारिक तौर पर 1997-98 के बजट में इसको प्रस्तुत किया गया। 2001 में महिला सशक्तिकरण वर्ष की घोषणा की गई।

भारत में जेण्डर बजटिंग :

जेण्डर प्रतिसंवेदी बजट अब तक विश्व के 62 देशों में लागू किया जा चुका है. जिसमें सर्वप्रथम आस्ट्रेलिया द्वारा अपनाया गया जबकि भारत में 2000-01 के बजट में जेण्डर प्रतिसंवेदी बजट को प्राथमिकता दी गई है, जो महिला सशक्तिकरण में समुदाय के विकास में जेण्डर प्रतिसंवेदी बजट महिला एवं पुरूष से अलग नहीं माना जाता है फिर भी भारत सरकार पर जेण्डर वर्गीकरण का प्रभाव पड रहा है।विकास के किसी भी क्षेत्र में महिलाओं एवं पुरूषों की स्थिति का विश्लेषण किया जाता है। प्रथम चरण से संबंधित क्षेत्र की नीतियां किस हद तक जेण्डर समानता को लाने में आने वाली बाधाओं को दूर करने में कारगर है, इसका विश्लेषण किया जाता है।बढ़ावा देने वाली नीतियों और उन पर आधारित कार्यकमों के लिए बनाये गये बजट और उनमें किये गये वित्तीय प्रावधानों का मूल्यांकन किया जाता है।

बजट में जो वित्तीय प्रावधान किये गये थे, उनके आधार पर व्यय हुआ या नहीं, इनके परिणाम निकले और उनसे किसे लाभ मिला आदि का विश्लेषण किया जाता है। नीतियों, कार्यक्रमों, योजनाओं का प्रभाव का मूल्यांकन करना, जिससे यह जाना जा सके कि जिन परिस्थितियों के आधार पर योजनाओं का निर्माण हुआ था, उनमें कितना बदलाव आया है।

नयी योजनाओं में लिंग आधारित नजरिये से मूल्यांकन :

 जेण्डर बजटिंग के माध्यम से महिलाओं की निर्णय लेने में मुख्य भूमिका को सुनिश्चित किया जा सकता है। सूक्ष्म स्तरीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बड़े स्तर पर मानचित्रण के अंतर्गत सामाजिक आधारभूत ढाचे और रोजगार के अवसरों तक पहुंच बढ़ाने के लिए स्थानीय मानचित्रण किया जाता है ताकि संसाधनों की उपलब्धता, जेण्डर समानता की कमियां, जनसंख्या के आधार पर संसाधनों की आवश्यकता आदि को जाना जा सके। सार्वजनिक नीतियों और उन पर किये जाने वाले व्यय के लिए मार्गदर्शक के तौर पर  महिला  व बाल विकास मंत्रालय के द्वारा इस संदर्भ में दो चेक लिस्ट के माध्यम से मार्गदर्शन प्रपत्र तैयार किया जाता है। महिलाओं और उनसे जुड़े हितों को बढ़ाने वाले विशेष कार्यक्रमों से संबंधित है। इसमें स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, ग्रामीण विकास, पेयजल, आदिवासी विकास, विज्ञान व प्रौद्योगिकी जैसे विभागों की योजनाएं शामिल है। विकास के ऐसे प्रमुख क्षेत्र जहां महिलाओं के विकास की योजनाएं जैसे - रक्षा, टेलीकॉम, परिवहन विभाग आदि भी है

इसके तहत सार्वजनिक व्यय का जेण्डर समानता के आधार पर - वर्णन किया जाता है। साथ ही योजनाओं के  माध्यम से होने वाले सार्वजनिक जेण्डर के आधार पर एकत्रित आंकड़ों और उनके प्रभावों का विश्लेषण किया जाता है। इसी प्रकार सरकार की नीतियों एवं  राजस्व के रूप में एकत्र की गयी राशि का महिलाओं और पुरूषों पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण भी किया जाता है।

महिला सशक्तिकरण में जेण्डर बजटिंग की भूमिका :

जेण्डर बजट के माध्यम से महिलाओं के सशक्तिकरण में निम्नलिखित कार्यों में मदद मिलती है।

नीतिगत उददेश्यों की प्राप्ति के मॉनिटरिंग : यह जेण्डर के प्रति जागरूक तरीके से सहस्त्राब्दी विकास एवं अन्य नीतिगत लक्ष्यों की उपलब्धि को मॉनीटर करने का साधन प्रदान करती है।

जेण्डर समानता प्राप्त करना : जेण्डर समानता उपलब्ध कराने के लिए महिलाओं एवं पुरूषों के लिए परिणामों की समानता आवश्यक होती है। इसका आशय यह है कि अलग-अलग आवश्यकताओं व हितों को मान्यता देना जो नीतियों एवं बजट आबंटनों से महिलाओं व पुरुषों को लाभ प्राप्त होने के तरीकों को प्रभावित करते हों ।

महिलाओं के अधिकारों की प्राप्ति की दिशा में प्रगति जेण्डर प्रतिसंवेदी बजट :  मानव महिला अधिकार दस्तावेजों  की दृष्टि से नीतिगत प्रतिबंद्धताओं संसाधन आबंटनों की पर्याप्तता एवं दोनों के परिणामों के बीच अंतरों  को मापने का प्रयास करती है। 

निर्धनता को अधिक प्रभावशाली तरीके से कम करना : यह बात व्यापक रूप से स्वीकार की गई है कि एक ही सामाजिक-आर्थिक तबके की महिलाओं के सामाजिक संकेतक पुरूषों को संकेतकों की तुलना में काफी कम है। महिलाएं और पुरुष निर्धनता का अलग-अलग प्रकार के दबाव का सामना करते है। महिलाएं पुरूषों की पुल तुलना में निर्धनता से अधिक प्रभावित होती . है। यदि महिलाओं की जरूरतों पर ध्यान न दिया जाये तो निर्धनता में कमी लाने के लिए नीतियों के विफल होने का खतरा होता है।

आर्थिक कार्यकुशलता को बढ़ाना : कन होती जेण्डर असमानता और उच्च संवृद्धि दरों के बीच एक सह संबंध है यदि सूचना, ऋण, इनपुट्स और बाजार तक महिलाओं की पहुंच को बढ़ाया जा सकता है और उनके समय के बोझ को श्रम बचतकारी निवेश के माध्यम से कम किया जा सकता है, तो महिलाओं की उत्पादकता असमानुपातिक रूप से बढ़ती है। 

उत्तम अभिशासन की प्राप्ति : निष्पक्ष न्यायपूर्ण उत्तरदायी विधि से महिलाओं, पुरूषा, बालकों एवं बालिकाओं को समान सेवाएं प्रदान करने की प्रकिया को उत्तम अभिशासन की परिभाषा को एक अभिन्न अंग मानना होगा। उत्तम अभिशासन के लिए सहभागिता की दष्टिकोण आवश्यक है  ताकि महिलाओं सहित नागरिको के विभिन्न प्ररिप्रेक्ष्य का प्रतिनिधित्व हो सके।

जवाबदेही और पारदर्शिता को बढ़ानाः जेण्डर विशिष्ट स्तर संकेतकों एवं लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए उद्देश्य सार्वजनिक व्यय की राशि के बीच के अंतरों को उजागर करने का एक सशक्त उदाहरण है। आबंटित पैसे को किस तरह से खर्च किया गया, इस पर नजर रखते हुए जबावदेही एवं पारदर्शिता को बढ़ाया जा सकता है।

जेंडर बजट की वास्तविक स्थिति एवं आवश्यक कदम

जेंडर बजटिंग के माध्यम से महिला कल्याण के लिये एक प्रतीकात्मक योजना की बजाय एक व्यावहारिक योजना बनाया जाए जिनके सारोकार सीधे तौर पर महिला कल्याण से जुड़े  ऊर्जा, शहरी विकास, खाद्य सुरक्षा, जलापूर्ति और स्वच्छता जैसे मुद्दों को भी महिला कल्याण से जोड़ना होगा क्योंकि अप्रत्यक्ष ही सही लेकिन ये सभी महिला कल्याण को महत्त्वपूर्ण ढंग से प्रभावित करते हैं।

महिलाओं को प्रत्यक्ष लाभार्थी बनाने की बजाय उन्हें विकास यात्रा की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी बनाना होगा। वास्तविक सुधारों के लिये जेंडर बजटिंग को महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता से जोड़ना होगा।

 दरअसल, लैंगिक समानता का सूत्र श्रम सुधारों और सामाजिक सुरक्षा कानूनों से भी जुड़ा है, फिर चाहे कामकाजी महिलाओं के लिये समान वेतन सुनिश्चित करना हो या सुरक्षित नौकरी की गारंटी देना। मातृत्व अवकाश के जो कानून सरकारी क्षेत्र में लागू हैं, उन्हें निजी और असंगठित क्षेत्र में भी सख्ती से लागू करना होगा। जेंडर बजटिंग और समाजिक सुधारों के एकीकृत प्रयास से ही भारत को लैंगिक असमानता के बन्धनों से मुक्त किया जा सकता है।

ज्ञात हो कि जेण्डर बजटिंग की बातें वर्षों से चल रही है लेकिन देश में पूर्णरूपेण अपनाया नहीं जा सका है। जेण्डर बजटिंग के माध्यम से महिला सशक्तिकरण के लिए सरकार से अपेक्षा की जाती है कि बजट महिलाओं के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो। महिला सशक्तिकरण की योजनाओं एवं नीतियों पर जो पैसा खर्च करती है उसका निश्चित हिस्सा पूरी तरह उन तक पहुंच सके। सरकार ने कुछ योजनाओं में जेण्डर बजटिंग आरंभ भी कर दिया है। लेकिन यह देखना आवश्यक है कि प्रत्येक महिला को लाभ मिला है या नहीं। महिलाओं को स्वास्थ, शिक्षा और आर्थिक मोर्चे पर बराबरी पर लाने के उद्देश्य से इस तरह का बजट बनाया जाता है। जेंडर बजटिंग के बावजूद कई मामलों में महिलाएं पिछड़ी हुई हैं अतः जेंडर बजटिंग कमजोर व गरीब तबके की महिलाओं को विशेष ध्यान में रखते हुए सरकार को कल्याणकारी योजनाओं के मधायम से  महिलाओं को समान अवसर मिल सकते हैं और उनकी स्थिति को बेहतर किया जा सकता है।