कोख में बेटी और धरती पर पानी खत्म हो जाए तो...
November 16, 2019 • डॉ. इन्दिरा मिश्रा

भ्रूण हत्या...आखिर क्यूं?

माँ को श्रेष्ठ मान हरदम दुनिया सर झुकाती है । हर धर्म में उसे ही अपना जहान बताती है फिर बेटी जन्म ले इस बात से ही, घबरा कर क्यूं मुहं छुपाती है दुनिया।। भ्रूण हत्या कैसे कर पाती है दुनिया? देवी को पूजती है, नाक रगड़ती है चरणों में, फिर उसका ही स्वरूप क्यूं नाले में फेंक आती है दुनिया।पाप और पुण्य का हिसाब लगाते है सभी हर पल, फिर भ्रूण हत्या का पाप कर कैसे इतराती है दुनिया। गर्भ धारण से जागती है मातृत्व की भावना, फिर इस सुख की कुर्बानी मांग क्यूं गर्भपात कराती है।  जग जाहिर है बेटा-बेटी का होना निर्भर है पिता पर, फिर माँ को ही क्यूं हर बार कसूरवार ठहराती है। सास भी एक औरत और माँ भी एक औरत, फिर कन्या भ्रूण को ही क्यूं गिराना चाहती है सपने उसके ब्याह के, बहु बनाने को कन्या कहां से आएगी, भूल जाती है ।  कुपुत्र हो तो कर सकता है दाने दाने को मोहताज, फिर भी पुत्री को अभिशाप मान, पुत्र ही क्यूं पाना चाहती है। कुलबुलाते होगें जहन में सबके, जानते है हम, फिर अपनी दफे सब भूल, भ्रूण हत्या को तैयार हो जाती है।

किसी भी समाज में या देश में लड़कियों की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी की लड़को की। जब तक हम अपने देश में इस लिंग अनुपात को सही तरीके से बेलेंस नहीं करेंगे, अपनी सोच में बदलाव नहीं करेंगे तब तक अपने समाज और देश में ये अंतर हमेशा ही रहेगा। नारी-जाति आधी मानव जाति है इस बात को जानते हुए भी दिनों-दिन लिंग अनुपात बहुत तेजी से बढ़ रहा है। आज के वक्त में माँ की कोख ही अपनी समय बेटी के लिए कब्रिस्तान बन चुकी है और किसी आया भी घर में हो रहे भ्रूण हत्या के लिए उस घर की लिए चिंता महिलाओं की भागीदारी सबसे अधिक रहती है। में लिंगानुपात झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे पिछडे । बड़ा राज्यों में भ्रूण-हत्या के आकड़े कम है जितने अभियान की अपने हरियाणा में सामने आते हैं। आएगाधन-धान्य, आर्थिक संपदा से परिपूर्ण फिर भी का दर्जा बेटियाँ सबको बोझ लगती रही है, ये बात हम सफल सबके लिए चिंताजनक है। ऐसा प्रदेश की हकीकत जानकर आप चौंक जाएंगे, लेकिन सच है, भयावह है। महेंद्रगढ़, रेवाड़ी, झज्जर, भिवानी, सोनीपत, गुड़गांव, रोहतक, पलवल, फतेहाबाद, कैथल आदि ऐसे जिले हैं, जहाँ सैकड़ों गांवो में वर्ष 2014 में एक भी बेटी ने जन्म ही नहीं लिया है या उन्हें जन्म लेने ही नहीं दिया गया। देश में सबसे कम बाल लिंगानुपात वाले महेंद्रगढ़ जिले की नारनौल तहसील की गांव चिंडालिया तो एक बानगी है, जिले के गांव, फतेहाबाद के 63 और करनाल के सात गांव ऐसे है, जहाँ पिछले एक साल में एक भी बेटी नहीं जन्मी।

कन्या भ्रूण हत्या जैसे घोर अपराध देवऋषियों की धरती भारत के लिये अभिशाप है- और देश के प्रधानमंत्री माननीय नरेन्द्र मोदी जी के बेटी बचाओ बेटी पढाओं अभियान के शरू होने से हमको पूर्ण विश्वास है कि अब हमारा देश इस अभिशाप से जल्द मुक्त हो जाएगा। इस सृष्टि की रचना देव कन्याओं ने रची थी और तब से आज तक कन्याए ही सृष्टि को रचती है अगर इसी तरह कन्याओं की भ्रूण हत्या होती रही तो यह सृष्टि ही लुप्त हो जायेगी क्योकि कन्याओं के बिना सृष्टि को कल्पना ही असंभव है। कहंदे ने कुख विच बेटी मुक जावे, ते जमीन विच पानी सुख जावे, तां जीना मुश्किल हो जावे। अर्थात अगर कोख में बेटी मर जाये और धरती में पानी सुख जाये तो जीना मुश्किल हो जाएगा भारत में बेटियों को देवी के रूप में पजा जाता है और बेटियों के जन्म को मां लक्ष्मी के आर्शीवाद रूपी वरदान समझा जाता है इसलिये जिस घर में कन्याओं के भ्रूण की हत्या होती है उस घर में मां लक्ष्मी का वास तो हो ही नहीं सकता इसके साथसाथ ऐसे कुल की कई पीढ़ियाँ कन्या भ्रूण हत्या के पाप का भोग भोगती है। ऋषि मुनि कहा करते थे कि कन्या के नन्हें नन्हे कदम जब घर के आंगन में पड़ते है तो उस घर के दुख दर्द दूर होते है और उस आगन में देवी देवताओं का वास आर्शिवाद के रूप में होने लगता है। वंश को बड़ाने के लालच में और बेटे को चाहत में आज मां बाप कन्याओं को गर्भ में मार कर वंश चलाने वाली जड़ों को ही काट देते है लेकिन वह यह ज्ञान नहीं रखते कि तीन वंशो को चलाने वाली बेटियां ही होती है बेटियां अपने मायके का वंश, ससुराल का वंश और अपना वंश चलाती है फिर कैसे लोग यह धारणा बना लेते है कि वंश केवल बेटों से चलता है हमारे देश ही नहीं विश्व में ऐसे बहुत उदाहरण है जिनके वंश केवल उनकी बेटियों के नाम से जाने जाते है फिर चाहे वह इंगलैंड । की रानी ऐलिजाबेथ हो या झासी की रानी लक्ष्मीबाई जिनके वंश को न केवल उनका देश बल्कि विश्व उनके नाम से जानाता है। इसलिए आओं अपने देश को कन्या भ्रूण हत्या के । अभिशाप से मुक्ति दिलाने का प्रण लें।