मानव अधिकार व कानून के बावजूद सामाजिक मानदंड के कारण घरेलू हिंसा प्रवल
November 30, 2019 • Sarvangin डॉ. इन्दिरा मिश्रा

हिंसा की व्यापक परिभाषा है। इसमें शारीरिक व यौनिक हिंसा के साथ भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक, मौखिक एवं आर्थिक हिंसा को भी शामिल किया गया है। महिलाओं को बच्चा न पैदा होने एवं केवल लड़कियों को जन्मने के कारण सताया जाना भी हिंसा में शामिल किया गया है। पुरुषों के हिंसक व्यवहार को रोका जाना जरूरी है, इस विचार की शुरुआत हो चुकी है। महिला पुरुष बराबरी की दिशा में स्पेन, अमेरिका व कनाडा में घरेलू हिंसा के बीच बचाव के व्यापक कदम उठाया है। घर के सारे काम-काज व बच्चों की देखभाल में पुरुषों को अब बराबरी से हाथ बंटाना होगा। तलाक कानून के तहत स्त्रियां पतियों के घर में सहयोग न देने पर तलाक की मांग कर सकती  है।

कड़वा सच यह है कि लड़की चाहे अपने घर में हो या ससुराल में उसे हमेशा नीचे का दर्जा ही दिया जाता है। पहले बाप से डरती है और ससुराल में डराई जाती है, और लड़की अत्याचार होने पर भी उसे सहती है क्योंकि वह घर में शांति का माहौल रखना चाहती है यह सोच लेती है कि दोनों परिवारों की भलाई के लिए उसका चुप रहना ही ठीक है और इसी कारण वह शिकायत दर्ज कराने से डरती है।

समाज में स्त्री व पुरुष का भेदभाव इतना गहरे व्याप्त है कि खुद ब खुद परिवार इस भेदभाव की मानसिकता को अवचेतन रुप से अपना लेता है। स्त्री पर हिंसा करने को पुरुष अपराध नहीं समझाता है, बल्कि यह एक साधारण स्थिति या एक आम बात लगती है। ठीक इसके विपरीत स्त्री अपने ऊपर किये अत्याचार को गलत नहीं समझती और बर्दाश्त करना अपना कर्तव्य समझती है, जिसके परिणाम स्वरुप उसमें एक प्रकार की हीन भावना उत्पन्न होती है वह अपना आत्म विश्वास खोने लगती है और अपने आप को दोषी मानने लगती है। स्त्री का निम्नस्तर स्वीकार करने पर, पुरुष का हिंसात्मक व्यवहार और भी प्रवल हो जाता है।

वे महिलाओं के खिलाफ हिंसा के हथियार का इस्तेमाल केवल शारीरिक बल ज्यादा होने के कारण नहीं करते हैं बल्कि इसलिए कि उन्हें इसके लिए सामाजिक मान्यता मिली हई है। 'पुरुषों के बिना औरत रह ही नहीं सकती।' 'घर का मुखिया तो पुरुष ही होता है ।' 'बिन पुरुष के स्त्री का अस्तित्व ही क्या?' 'भले ही कानून ने नहीं पर समाज ने तो हमें यह अधिकार दिया है कि हम अपनी बीवियों की पिटाई कर सकें।''अगर स्त्रियों को बहुत आजादी दी जाएगी तो वे घर-परिवार की इज्जत मिट्टी में मिला देंगी उनको काबू में रखना जरूरी है।' 'अगर मैं अपनी बीवी को मारता हूं तो उस पर सवाल-जवाबकरने का हक किसी का नहीं बनता। उसे डराकर तो रखना ही होगा।' यह बहुधा ही सुनी-सुनाई बातें तो हैं ही, अध्ययन से निकलकर आया कि पुरुष हिंसा को जीवन का आम हिस्सा मानते हैं और स्त्रियां प्रायः इस डर तले जीती हैं। आम धारणा यह है कि पुरुषों को पूरा अधिकार है कि वे औरतों की गलतियों की सजा उन्हें पीटकर दें। यह अविवाहित युवाओं की भी प्रतिक्रिया थी। वे मां को देवी तो मानते हैं पर यह भी कि वे भी गलतियां कर सकती हैं। पत्नी पर तो भरोसा किया ही नहीं जा सकता। बहनों और बेटियों पर नियंत्रण रखना वे अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं। कमोबेश स्थिति सारी दुनिया में यही है। सिवाए नार्डिक देशों (नार्वे, स्वीडन, फिनलैंड, डेनमार्क और बेल्जियम) के लगभग सभी देशों की स्त्रियां पुरुषों द्वारा की गई हिंसा की समस्याओं से जूझ रही हैं। फिर चाहे वह अमेरिका हो या इंग्लैंड या अफ्रीका या फिर जापान समेत सभी पूर्वी एशियाई देश। समाजशास्त्री विश्लेषण द्वारा इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि महिलाओं पर हिंसा उनको दोयम स्थान दिए जाने के कारण होती है। स्त्रियों को अपने अधीन रखने व उन पर अपनी सत्ता का सिक्का जमाने के लिए पुरुष हिंसा के हथियार का इस्तेमाल करते हैं। स्त्री के आक्रामक व्यवहार को समाज बर्दाश्त नहीं कर पाता है और उसे तुरंत बुरी औरत की संज्ञा दे दी जाती है।

स्त्री को दोयम स्थान पर रखने की मानसिकता के चलते पुरुष स्त्री की देह पर अपना पूर्ण नियंत्रण चाहता है। स्त्री की देह को वह अपने उपभोग और मनोरंजन की वस्तु मानता है। वह उसकी देह पर एकाधिकार छोड़ने को कतई तैयार नहीं होता। स्त्री को अपने वश में रखने के लिए वह प्यार व मनौवल का हथियार भी इस्तेमाल करता है। राजा हो या रंक, अपनी पत्नी या स्त्री साथी पर पूर्ण आधिपत्य चाहता है। लड़की को इस नसीहत के साथ ही पाला जाता है कि पति तुम्हारे स्वामी, तुम्हारे भाग्यविधाता हैं। यहां तर्क-वितर्क की कोई गुंजाइश ही नहीं है क्योंकि तर्क तो बराबर वालों से होते हैं। यदि वह इस दायरे से बाहर आती है तो उसे कुल्टा करार कर दिया जाता है। फिर तो उसे मृत्यदंड तक दिया जा सकता है।

महिलाओं को घरेलू हिंसा से राहत दिलाने के लिए घरेलू हिंसा महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 व घरेलू हिंसा महिला संरक्षण नियम 2006 में पारित हुए, जिसके तहत अगर महिला पर कोई अत्याचार हो रहा है तो वह कानून की मदद ले सकती है और इसके लिए उसे थाने जाने की जरुरत भी नहीं है वह एक फोन द्वारा भी शिकायत दर्ज करा सकती है। भारतीय संविधान में स्त्री व पुरुष को समान अधिकार प्राप्त अधिनियम में "व्यथित व्यक्ति से कोई भी महिला अभिप्रेत है जो प्रत्यार्थी की घरेलू नातेदारी में है, या रही है, और जिसका अभिकथन है कि वह प्रत्यार्थी द्वारा किसी घरेलू हिंसा का शिकार रही है।

पुरुषों के बराबर महिला को भी समानता का अधिकार देश का संविधान देता  है, परन्तु समाज में उन्हीं स्त्रियों को लेकर भेदभाव किया जाता है जिसका असर समाज की सबसे छोटी इकाई परिवार में नजर आता है जबकि घर को सामाजिक रूप से सबसे  सुरक्षित स्थान माना जाता है।  इस भेदभाव का शिकार "स्त्री” बनती है व असुरक्षित वातावरण में अपना जीवन यापन करती है।