महिला भी मनुष्य होती है
November 16, 2019 • Sarvangin डॉ. इन्दिरा मिश्रा

 

नारी को देवी या दासी की उपाधि के ऊपर उठ कर इंसान के तौर पर समझा जाना चाहिए, आखिर महिला भी एक मनुष्य ही है और उसके भी कुछ मानवाधिकार है।

अब तक समाज के भेदभाव और प्रतिक्रियावादी नरिए ने महिलाओं को उनके पूर्ण नागरिक अधिकार से वंचित रखा है, इस प्राकृतिक मानवाधिकार के लिए हर औरत को अदम्य एवं अटूट इरादे के साथ लड़ना चाहिए। इस लड़ाई में किसी भी प्रकार के ठहराव या विश्राम करने की अनुमति नहीं है। मैं दुनिया से क्रांतिकारी बनने का अनुरोध करती हूँ। आज मानव अधिकार सम्पूर्ण विक्ष की एक आधारभूत आवश्यकता है। मानव अधिकारों के अभाव में समूची मानव जाति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 10 दिसम्बर 1948 को जिन मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा की गई, उन्हें समस्त विश्व के नागरिकों के अधिकारों एवं स्वतंत्रता की दिशा में प्रभावी माना गया है। संयुक्त राध संघ ने अपने घोषणा पत्र में जो मानव अधिकार घोषित किए, वे ही भारतीय संविधान में मूल अधिकारों के रूप में नागरिकों को प्रदान किए गए हैं। अत: इनका संरक्षण हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। मानव अधिकारों को सार्थकता और व्यावहारिकता पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है और उनका हनन विस भर में गम्भीर रूप लेता जा रहा है। आधुनिक विश्व के माथे पर मानव अधिकारों के हनन का कलंक लज्जास्पद है। वस्तुतः विश्व के कुछ ही भागों में मानव अधिकार तथा आधारभूत स्वतंत्रता सुरक्षित है। अधिकतर देशों को इनकी समझ तक नहीं है। अज्ञान या अशिक्षा के कारण वहां अभी इनका कोई अर्थ ही नहीं है। हालांकि मानवाधिकारों को प्रोत्साहित करने तथा उनके संरक्षण हेतु उपयुक्त अन्तराष्ट्रीय कानून का अभाव नहीं है परन्तु आवश्यकता इस बात की है कि सम्बन्धित राज्य या पक्षकार उनका पालन करें। निर्धनता, बाल श्रम, बाल अपराध, बाल विवाह, भ्रूण हत्या, दहेज अपराध, वेश्यावृत्ति, मानव तस्करी, रंग-भेद, अमिकों का शोषण, आतंकवाद आदि अनगिनत ऐसे मुद्दे हैं, जहां मानवाधिकारों का हनन स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। विश्व के अग्रणी राष्ट्र अमेरिका में भी अनेक  लोगों पर हो रहे अत्याचार की घटनाएं आए दिन अखबार की सुर्खियों में होती है। अनेक देशों में राजनीतिक बन्दियों पर मुकदमा चलाए बिना ही उन्हें वर्षों तक कारागार में रखा जाता है, तो कहीं ऐसे बन्दियों को बिजली के झटके देकर अमानवीय यातना दी जाती है। कई देशों के शासक तो अब भी कोड़े लगाने और हाथ कटवा देने जैसे अमानवीय दण्ड देने से भी नहीं कतराते। ई 2014 में लाहौर हाई कोर्ट के सामने पच्चीस वर्षीया एक गर्भवती महिला फरजाना इकबाल की उसके परिजनों ने पत्थर मार-मारकर इसलिए हत्या कर दी कि उसने मोहम्मद इकबाल से प्रेम विवाह किया था। लगभग 15 मिनट तक उसके परिजन उस पर पत्थरों से प्रहार करते रहे। इकबाल उसके प्राणों की भीख मांगता रहा, पर कोई न पसीजा। पुलिस भी मूकदर्शक बनी रही। इस बर्बर हत्या की विश्व भर में निंदा हुई। मगर पाकिस्तान सरकार और वहां के मानव अधिकार आयोग ने क्या किया। तदनुसार वहां 569 महिलाओं को सम्मान के लिए मारे जाने की खबरें आई जबकि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है। यह नृशंसता मानव अधिकारों का हनन नहीं तो क्या है? हाल ही में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार जांचकर्ताओं ने एक रपट प्रस्तुत की है। तीन सौ से अधिक प्रत्यक्षदर्शियों के बयान के साथ ही इस्लामिक स्टेट (आई.एस.) अनुचित कपड़े पहनने पर महिलाओं को कोडे मारे जा रहे हैं या पत्थर मार कर हत्या की जा रही है। ईरान में एक ब्रिटिश ईरानी महिला गोनवेह गवामी को हिरासत में लिया गया था और अब एक साल कैद की सजा दी गई है क्योंकि वह ईरान-इटली के बीच पुरुष वालीबाल  मैच देखने की कोशिश कर रही थी।

नारी को देवी या दासी की उपाधि के ऊपर उठ कर इंसान के तौर पर समझा जाना चाहिए, आखिर महिला भी एक मनुष्य ही है और उसके भी कुछ मानवाधिकार है।