मुस्लिम समाज की साधारण महिलाओं ने असाधारण क्षमताओं के साथ समान अधिकारों का उठाया बीड़ा
November 23, 2019 • Sarvangin डॉ. इन्दिरा मिश्रा

लैंगिक असमानता को जब धर्म के पक्षपातियों ने दीन की आड़ में सही बताया तब मुस्लिम समाज की साधारण महिलाओं ने अपनी असाधारण क्षमताओं को जगाया और समान अधिकारों की लड़ाई स्वयं लड़ने का बीड़ा उठाया।

1956 का हिंद विवाह अधिनियम और अनुवर्ती संशोधनों के कारण बहुसंख्यक समाज की महिलाओं का सशक्तिकरण बढा। इसके विपरीत अल्पसंख्यक समाज की महिलाएं चुपचाप सामाजिक असमानताओं को धर्म की आड में सहती रहीं। लैंगिक असमानता को जब धर्म के पक्षपातियों ने दीन की आड में सही बताया तब मुस्लिम समाज की साधारण महिलाओं ने अपनी असाधारण क्षमताओं को जगाया और समान अधिकारों की लड़ाई स्वयं लड़ने का बीड़ा उठाया और एक पंथनिरपेक्ष देश के नागरिक होने के नाते सर्वोच्च न्यायलय की गुहार लगाई। 22 अगस्त 2017 वो ऐतिहासिक दिन था जब न्यायलय ने तीन-तलाक (तलाक-ए-बिददत) को अमान्य घोषित कर दिया। इस न्यायसंगत फैसले के लिए संघर्ष तब शुरू हुआ जब 1975 में शाह बानो नाम की महिला ने कोर्ट में अपने और अपने पांच बच्चों की आर्थिक सहायता के लिए अपील की जिसके परिणामस्वरूप उन्हें रखरखाव की राशि मिली। परन्तु तत्कालीन राजीव गाँधी सरकार ने उस समय राजनीतिक प्रभाव और अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) के दबाव के रहते संसद में मुस्लिम महिला (तलाक सरंक्षण अधिनियम), 1986 को पारित करवा लिया। इस अधिनियम ने न्यायलय का फैसला जो शाह बानो के पक्ष में था उसे निरर्थक कर दिया। इस अधिनियम में तलाक के बाद मुस्लिम महिलाओं को केवल 10 दिनों के लिए आर्थिक सहायता का प्रावधान था। अपने अधिकारों की मांग को साकार रूप देने में मुस्लिम महिलाओं को 3 दशक से अधिक समय लग गया।

सरकार और न्यायालय के सकारात्मक रूख के बाद भी इस निर्णय ने कई संगठनों को उत्तेजित कर दिया। तणमल कांग्रेस के विधायक और वर्तमान में राज्य पुस्तकालय और जन शिक्षा मंत्री, सिद्दीकुल्ला चौधरी, ने आरोप लगाया कि न्यायाधीशों ने बिना इस्लाम और इसके अनुष्ठानों की जानकारी के यह फैसला लिया है। कई संगठन जैसे जमीयत उलेमा-ए-हिंद, दारुल उलूम देवबंद, जमात-ए-इस्लामी हिंद, मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी फैसले पर नाराजगी व्यक्त की थी। मुस्लिम समाज की महिलाओं को समानाधिकार दिलाने पर शासन और न्यायपालिका की सोच देख कर कई इतने आतंकित हो गए हैं कि इसे यूनिफार्म सिविल कोड की दस्तक मान रहे हैं।

मस्लिम समाज के भीतर लिंग भेदभाव पर काबू पाने हेतू प्रयासरत सरकार ने मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक 2017 संसद के दोनों सदनों में पास करने का प्रयास किया। लोकसभा में सरकार का बहुमत होने के कारण विधेयक पास हुआ किन्तु विपक्षी दलों ने इसे राज्य सभा में पारित नहीं होने दिया। यह विधेयक तत्काल तीन तलाक को अवैध घोषित कर, आरोपी को 3 साल तक की सज़ा का भी प्रावधान रखता है। इसमें मुस्लिम महिला को अपने और अपने नाबालिग बच्चों के लिए आर्थिक सहायता की मांग का अधिकार देना भी प्रस्तावित है। महिला अपने बच्चों के संरक्षण की भी मांग कर सकती है। आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) पाटी के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने संसद में इस विधेयक का पुरजोर विरोध किया। एआईएमपीएलबी ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में दसे मस्लिम महिलाओं के अहित में बताया। सरकार अब तीन तलाक पर अध्यादेश लाने का प्रयास कर रही है।

 पंथ और समाज ऐसी रूढ़िवादी प्रथाओं से ग्रसित रहे हैं जिसने नारी को समानता का स्थान, सामाजिक और आर्थिक रूप से नहीं दिया। कुछ में वह सांस्कृतिक दक्षता थी की वे तर्क, विवेचना दवारा सामाजिक अपूर्णताओं आलोचना तैयार करने और सुधार का मार्ग निर्धारित करने की प्रवीणता रखते थे। कई सामाज सधारक जैसे राजा राम मोहन रॉय, ईश्वर चंद विद्यासागर, स्वामी दयानंद सरस्वती, ज्योतिराव फुले ने इस दिशा में काम किया।

मुस्लिम समाज के धर्म गरु कटटरपंथी और रूढिवादी सोच से बाहर नहीं आ पा रहें  है। अगर वह स्वयं इस पूर्वाग्रह को त्यागने की दूरदृष्टि रखते तो मस्लिम महिलाओं को न्यायलय की चौखट पर ना जाना पड़ता। भारतीय मुस्लिम समाज के सामने उदाहरण है पाकिस्तान, टयनीशिया, अफगानिस्तान, कुवैत, मलेशिया जैसे मुस्लिम देशों का, जिन्होंने अपने निजी कानूनों को संहिताबदध कर दिया है और तत्काल ट्रिपल तलाक को प्रतिबंधित कर दिया है। मुस्लिम समुदाय समान नागरिक संहिता और समान आपराधिक काननों से इस लोकतंत्र में शासित हैसमय आ गया है कि वे अपने व्यक्तिगत कानूनों को भी समान संहिता की परिधि के भीतर लाएं और अपने समाज की महिलाओं को एक पंथनिरपेक्ष लोकतंत्र में गरिमापूर्ण जीवन जीने का अवसर दें