नारी सशक्तिकरण एक सतत सामाजिक प्रक्रिया विकास का पर्याय नहीं
November 20, 2019 • Sarvangin डॉ. इंदिरा मिश्रा

महिला सशक्तिकरण का मुख्य पक्ष स्त्रियों के अस्तित्व का अधिकार और समाज द्वारा उसकी स्वीकार्यता है। महिलाओं द्वारा स्वयं के शरीर पर, प्रजनन में, आय पर, श्रम शक्ति,पर सम्पत्ति पर, सामुदायिक संसाधनों पर नियंत्रण कर पाना सबलीकरण ही  सशक्तिकरण का उद्देश्य महिलाओं की सामाजिक एवं आर्थिक दशा को सुधारना, समाज या समदाय ज या समुदाय से जुड़े मुद्दों पर निर्णय लेने अथवा नीति लागू करने की क्षमता लागू करने की क्षमता प्रदान करना  हैं।

महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ता है और शक्ति को अधिकतम बढ़ाने में सहायक है। वर्तमान में महिलाओं का स्व-विकास उनके सशक्तिकरण को इंगित करता हैं। सामान्य शब्दों में, महिला सशक्तिकरण से आशय- महिलाओं को पुरूषों के बराबर संवैधानिक, राजनीतिक, शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में उनके परिवार, समुदाय, समाज एवं राष्ट्र की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में निर्णय लेने की स्वायत्तता से है। सामाजिक संदर्भ में, शक्ति का आशय नियंत्रण करने की क्षमता, निर्देशन की क्षमता, से लगाया जाता है। किसी भी समाज में वह व्यक्ति शक्तिशाली रक्षा करने की क्षमता एवं किसी को सहारा प्रदान करने की क्षमता बिना सहारे के समाज में स्वयं को स्थापित कर सके। है।  रिचर्ड कार्वर जो कि कॉवरडेल संगठन के प्रबन्ध निदेशक थे, . के अनुसार, "सशक्तिकरण में व्यक्ति स्वयं अपने लिये कार्य करने के सर्वश्रेष्ठ तरीके की खोज करता है।" सशक्तिकरण का सामान्य अर्थ यह है कि शक्ति को पुनः सभी वर्गों में दक्षतापूर्वक बाँटा जाये। सशक्तिकरण एक ऐसी शक्ति है, जो किसी व्यक्ति को एक प्रभावी पद प्रदान करती है। सशक्तिकरण एक प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति अपने पूर्ण कौशल से किसी कार्य को करने में योगदान कर सके। इसके द्वारा व्यक्ति में उत्तरदायित्वपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता का विकास होता है और व्यक्ति सम्भावनाओं की अपेक्षा सच के साथ जीना सीखता है। अतः सशक्तिकरण एक प्रक्रिया भी है जो व्यक्तियों में आत्मविश्वास को जगाती है तथा सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुति करने के लिये प्रेरित करती है ।

सशक्तिकरण को सिर्फ आर्थिक गतिविध्यिों में महिलाओं की सहभागिता के रूप में नहीं लेना चाहिये क्योंकि आर्थिक गतिविधियाँ हमेशा महिलाओं की स्थिति सुधारने वाली नहीं होती और महिलाओं पर अधिक कार्य अथवा भार लाद देती हैं। सशक्तिकरण विषय पर जो रॉलैंड के अनुसार कुछ लोगों के पास दूसरों को नियंत्रित करने की शक्ति का होना अर्थात् प्रभुत्व का एक साधन और दूसरे का अभिप्राय है शक्ति का उपार्जन, विचार करने की शक्ति, हितों के संघर्ष के बिना नेतृत्व करने की शक्ति, ऐसी शक्ति जो 'के उपर शक्ति' वालों की दमनकारी लक्ष्यों और इच्छाओं को चुनौती दे सके तथा विरोध भी कर सके। महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया में इस प्रकार शामिल करना कि उनकी राजनीतिक ढाँचों तथा निर्णय लेने की प्रक्रिया, बाजार, आय और अधिक सामान्य ढंग से कहें तो राज्य तक पहंच हो जहाँ वे परिवार, समुदाय अथवा राज्य के साथ अपने लिये अवसरों को अधिकतम बढ़ा सकें। प्रकार सशक्तिकरण एक प्रक्रिया है और इसे विकास का पर्याय नहीं समझना चाहिये।