राम... आज भी जीवन के आधार
November 12, 2019 • डॉ.इंदिरा मिश्रा

सब यही चाहते हैं कि अपनी जिंदगी को अच्छे तरीके से जियें, इस जिंदगी को सद्गुणों से भरे; एक ऐसी जिंदगी जियें, जिसमें हम औरों की जिंदगी को भी कुछ बेहतर कर सकें। पर उम्र के साथ जब हमारी जिंदगी में ऐसे वाकिये होने शुरू हो जाते हैं, जिनमें हमें लगता है कि लोग हमारा फायदा उठा रहे हैं या जो हमारा है, उसे लेने की कोशिश कर रहे हैं, तो फिर हम अपनी जिंदगी के रास्ते को बदल देते हैं और औरों की मदद करने के बजाए, हम इस ताक पर रहते है कि हमारा फायदा कैसे हो। फिर हमारे कार्य, हमारे बोल कुछ ऐसे हो जाते हैं, जिनसे औरों की जिंदगी में सुख-चैन की बजाय, दुख-दर्द बढ़ना शुरू हो जाता है। कोई ऐसा इंसान नहीं, जो इस जिंदगी में आकर कोई दुख नहीं झेलेगा। एक लोलक की तरह जिंदगी झूलती रहती है, खुशी और गम के लम्हों के बीच। होता क्या है कि जो खुशी के मौके होते हैं, वे बहुत थोड़े लगते हैं और दुख के मौके बहुत ज्यादा लगते हैं, क्योंकि इसमें हम सोचते हैं कि शायद जरूरत के समय हमारी कोई भी मदद नहीं करेगा। इस कारण हम अपने आपको दुखों से घिरा पाते हैं और फिर हम सिर्फ अपने लिए जीना शुरू कर देते हैं। एक वृक्ष बहुत हरा-भरा रहता था। उस पर फल और फूल भी बड़े अच्छे लगते थे। बहुत से परिन्दे उस पेड़ के ऊपर रहते थे और वहीं खातेपीते थे। वह बहुत बड़ा पेड़ था। कई मुसाफिर उस पेड़ की छाया के नीचे आकर आराम किया करते थे। आसपास इतनी रौनक लगी रहने से वह पेड़ बड़ा खुश रहता था। उसे लगता था कि मैं किसी की मदद कर रहा हूं उसे लगता था कि मैं इस धरती पर आया हूं, तो इससे कुछ फायदा होरहा है, क्योंकि परिन्दों को खाना मिलता है, मुसाफिरों को छाया मिलती है। जब वे थके हुए आते हैं, पसीने और गर्मी से उनकी बुरी हालत हो रही होती है तो वे यहां आकर कुछ देर आराम कर सकते है। ऐसे ही पेड़ की जिंदगी गुजर रही थी। समय के साथ पेड़ के ऊपर पत्ते और फूल उगने बंद हो गए। साथ ही फल आने भी बंद हो गए। जब एसा हुआ, ता उस पढ़ पर परिन्दा ने आना बंद कर दिया। उन्हें लगा कि सारी शाखाएं तो सूख गई है- कहीं पर हरियाली नहीं, सब जगह सूखी-सूखी टहनियां ही दिखाई दे रही हैं। तब परिन्दों ने उस पेड़ पर आना बंद कर दिया, तो उस पेड़ को बड़ी तकलीफ हुई। उसने यह भी देखा कि पत्ते नहीं आ रहे हैं, तो वह छाया भी नहीं दे पा रहा है। इसलिए मुसाफिरों ने भी रुकना बंद कर दिया। तो पेड़ या निरुत्साहित हो गया कि मैं तो उम्र भर इन सबकी मदद करता रहा. लेकिन मेरे बुढ़ापे के समय में मुझसे बात करने भी कोई नहीं आ रहा। । एक दिन एक संन्यासी आए और उन्होंने पेड़ है रहा के नीचे बैठकर तपस्या करनी शुरू कर दी। जब वे तपस्या में बैठे हुए थे तो उन्हें ऐसा लगा कि जैसे दो पानी की बूद उनके ऊपर गिरी हैं। उन्होंने ऊपर की ओर देखा ने उन्हें लगा कि पेड़ रो रहा है। उन्होंने पेड़ से पूछा 'भाई, तुम रो क्यों रहे. हो?' पेड़ ने कहा, 'जब मैं छोटा था, तंदुरुस्त था, मेरे ऊपर बहुत हरे-भ पत्ते होते थे, बहुत से फल-फूल होते थे और मैं लोगों की बहुत मदद करता था। लेकिन अगम बूढ़ा हो गया हमर ऊपर न पत्ते, न फूल न फल आते हैं। जल्द मुझे काटने के लिए कुछ लंग आ रहे हैं, ताकि मेरी लकड़ी इस्तेमाल हो। इसलिए मुझे रोना आ रहा है कि मैं जिंदगी भर सबकी मदद करता रहा और अब मेरे बुढ़ापे में कोई मेरी मदद करने नहीं आ रहा और कल मेरी मृत्यु हो जाएगी।' संन्यासी ने पेड़ से कहा, 'इसमें डरने की क्या बात है? तुम अपने नजरिए को थोड़ा-सा बदलो और सोचने का तरीका भी थोड़ा-सा बदलो। तुम यह समझो कि तुम अपनी मौत में भी उन सबकी मदद कर रहे हो, क्योंकि जब वे तुम्हें काटेंगे, तो तुम्हारी लकड़ी का भी तो कहीं पर इस्तेमाल होगा, वह भी तो कोई इंसान इस्तेमाल करेगा।' इतना सुनते ही वह बड़ा खुश हो गया। इस खुशी के अतिरेक ने उसमें हरियाली ला दी और फिर उसे कोई काटने के लिए नहीं आया। हमारा नजरिया क्या है, उससे बहुत फर्क पड़ता है। हम किसी चीज को कैसे लेते हैं, यह हम पर निर्भर करता है। अगर एक गिलास में पानी आधा भरा हुआ है, तो कोई कहेगा गिलास आधा भरा हुआ है, जबकि कोई कहेगा कि गिलास आधा खाली है, अपने-अपने नजरिए की बात है। महापुरुष हमें वारंवार समझाते है कि हमें ऐसी जिंदगी जीनी चाहिए, जिसमें हम औरों के मददगार हों, जिसमें निष्काम सेवा-भाव से हम अपनी जिंदगी गुजारें, क्योंकि जब इस सद्गुण को अपनी जिंदगी में ढालेंगे, तो हम देखेंगे कि हमारा फायदा ही फायदा होगा। हम ऐसी जिंदगी जिएं, जिसमें हम औरों के मददगार बनें, क्योंकि जब हम ऐसी जिंदगी जीते है, तो उसका फल अपने-आप हमें मिलता है। उस वक्त शायद हमें लगे कि हमें फल नहीं मिला। लेकिन जो कमी का विधान है, वह बड़ा रोचक है। उसमें यह नहीं है कि तुमने अभी किया, तो तत्काल नतीजा आ जाएगा। अगर आप बीज बोते हैं, तो उसका पेड़ बनने में काफी देर लगती है। ऐसे ही कर्मों का विधान है, जो कहता है कि, 'जैसी करनी, वैसी भरनी।' जब हम किसी की मदद करते हैं, तो हम औरों को अपने जैसा ही समझते हैं। हम अहंकार से दूर हो जाते हैं, क्योंकि जब अहंकार होगा, तो हम सोचेंगे कि हम ऊंचे हैं और बे नीचे हैं। जब हम सोचेंगे कि हम ऊंचे हैं, तो फिर हम किसी को प्रेम की नजर से नहीं देखते, फिर हम उनकी मदद नहीं कर सकते। और हर एक को एक नजर से कौन देख सकता हर एक को एक नजर से कौन देख सकता जिसने खुद अपने अंदर प्रभु के दर्शन किए जो खुद प्रभु से जुड़ा हुआ हो, जो देखता हो वह प्रभु का अंश है। तो फिर हम में से औरों लिए सिर्फ प्रेम ही प्रेम प्रसारित होगा। हम ऐसी जिंदगी जियें, जिसमें हम हर एक को अपना ही समझें और हम प्रभु के प्रेम को बांटें। हम किसी की मदद करें, ताकि उनकी जिंदगी में भी कुछ सुख-चैन आए, जब इंसान ऐसी जिंदगी जीता है, तो उसको अपनी जिंदगी हरी-भरी होनी शुरू हो जाती है। वह जहां भी जीता है, वहां पर शांति का माहौल हो जाता है।