समाज के हिंसक सोच के बीच कैसे हो महिला मानव अधिकार सुरक्षित
November 30, 2019 • Sarvangin डॉ. इन्दिरा मिश्रा

अब तक समाज के भेदभाव और प्रतिक्रियावादी नरिए ने महिलाओं को उनके पूर्ण नागरिक अधिकार से वंचित रखा है, इस प्राकृतिक मानवाधिकार के लिए हर औरत को अदम्य एवं अटूट इरादे के साथ लड़ना चाहिए। इस लड़ाई में किसी भी प्रकार के ठहराव या विश्राम करने की अनुमति नहीं है। मैं दुनिया से क्रांतिकारी बनने का अनुरोध करती हूँ। आज मानव अधिकार सम्पूर्ण विक्ष की एक आधारभूत आवश्यकता है। मानव अधिकारों के अभाव में समूची मानव जाति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 10 दिसम्बर 1948 को जिन मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा की गई, उन्हें समस्त विश्व के नागरिकों के अधिकारों एवं स्वतंत्रता की दिशा में प्रभावी माना गया है। संयुक्त राध संघ ने अपने घोषणा पत्र में जो मानव अधिकार घोषित किए, वे ही भारतीय संविधान में मूल अधिकारों के रूप में नागरिकों को प्रदान किए गए हैं। अत: इनका संरक्षण हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। मानव अधिकारों को सार्थकता और व्यावहारिकता पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है और उनका हनन विश्व भर में गम्भीर रूप लेता जा रहा है। 

हिंसा सदा गैरबराबरी के शक्ति समीकरणों में होती है। पुरुष खुलेआम स्त्रियों के लिए अनादर एवं अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हैं जबकि इसके विपरीत शायद ही कभी होता हो। समाज के निचले पायदान पर होने के कारण दंगे फसादों व युद्धों की स्थिति में तो स्त्रियां ज्यादा पीड़ित होती ही हैं प्राकृतिक आपदाओं जैसे भूकंप, बाढ़ या सूखे की स्थितियों में भी वे ज्यादा कष्ट पाती हैं। विस्थापन एवं पुनर्स्थापना के भी विपरीत प्रभावों का भार भी उन्हें ज्यादा उठाना पड़ता है।