समाज में आज्ञाकारी रोबोट की भूमिका निभाती स्त्रियाँ
November 16, 2019 • डॉ. इन्दिरा मिश्रा

काश कि इस स्त्री रूपी  रोबोट की भावनाओं एवं संवेदनाओं को  मालिक समझ पाता

काश! कि हम इंसान मशीन या रोबोट की तरह होते. जिनके सीने में दिल नहीं बल्कि प्रोग्रामिंग की हई चिप होते  हम सिर्फ इस चिप में फी ड प्रोग्राम के हिसाब से कार्य करते. न रोते. न हँसते. न कोई दुःख होता. न हो खुशी दिलचस्पा होती. न रिश्ते होते. न ही नाते होते. न किसी से लगाव न ही दुश्मनी या कड़वाहट। जब बटन दबाया तब कार्य करने लगे और बटन फिर से नया दबाया तो बंद होकर अपने स्थान पर वापस स्थिर हो गये और जब कार्य करते करते यह रोबोट या मशीनरी खराब हो जाती तो हमारे मालिक हमें और टोक पीटकर या चिपबदलकर नयी बैटरी डाल वापस काम करने योग्य बना देता और हम फिर बिना सोचे-समझे शुरू हो जाते पूर्व निर्धारित कायों को करने के लिए।

शायद हम स्त्रियों को देखकर ही वैज्ञानिको के दिमाग में आई होगी। हम स्त्रियाँ भी तो निर्धारित जीवन जीती हैं। परम्पराओं और कर्तव्यों के प्रोग्राम संस्कार रुपी मानदंडों को चिप में फीड कर हमारे अन्दर डाल दिए जाते है और उसके अनुरूप ही व्यवहार या कार्य करने की उम्मीद की जाती है। न करो तो हमारी क्वालिटी को खराब कहने तक से कोई गुरेज नहीं करता  हमारी यहाँ तक कि हमारे मैनुफेक्चरर को दोष दिया जाता है कि उसने हमारी प्रोग्रामिग  सही  नहीं की इसीलिए हर मैनुफेक्चरर पूरी सावधानी  हमारी प्रोग्रामिंग करता है जैसे कि हमें कैसे हँसना, कैसे बोलना है आँखें झुकी हुई रखनी है, ज्यादा आँखे फाड़ फाडकर यहाँ वहां नहीं देख  ना है, कैसी सखी सहेलियां हो,किससे बात करनी है. किससे नहीं पराये लडके के  वायरस के प्रति सतर्कता बहुत ज्यादा होती है कि फिर एक दिन ऐसे ही एक वायरस को इस रोबोट का नया मालिक बताकर उसे रोबोर सौंप दिया जाता है। गए। काफी सारे पैसे रोबोट की साज सज्जा पर खर्च किये जाते हैं परंतु उस चीज को अपनी पसंद से नहीं बल्कि मालिक की पसंद से स्वीकार करे। रोबोट की वेशभूषा साजसज्जा तक रोबोट खुद नहीं कर सकता। यहाँ तक कि उसके जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक बैटरी भी मालिक की पसंद की हो उसे मिलती है। धीरे –धीरे  जब एक के बाद एक सभी कलपुर्जे देखरेख के अभाव में घिसने और खराब होने लगते हैं मालिक उसे मैकेनिक के पास ले जाकर उसकी मरम्मत करवाना पैसे की बर्वादी समझता है आखिर पुराने घिसे पिटे उपकरण में पैसा कौन लगाए ।जब तक काम कर रहा है ठीक है, जब बिलकुल दम तोड़ देगा तो दे देंगे रिसाइकिल वालों को और फिर भगवान् रुपी रिसाईकलर इस टूटे फूटे रोबोट को गलाकर नए सांचे में ढालकर एक नया प्रोडक्ट बनायेगा

काश कि इस स्त्री रूपी  रोबोट की भावनाओं एवं संवेदनाओं को  मालिक समझ पाता, न कोई अपना न हो पराया। ऐसी स्थिति में हमारे  साथ जो होते भी हैं तो उनसे कुछ उम्मीद करना तो जैसे अपने ही कातिल से जान बख्शने की उम्मीद रखना होता है।