सतर्क समाज रोक सकता है दहेज का दानव
January 14, 2020 • डॉ. इंदिरा मिश्रा Sarvangin

आज स्त्रियां शिक्षित होकर सफलता के नये आयामों को पार कर रही है ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्त्रियाँ शिक्षा द्वारा आत्मनिर्भर बन रहीं हैं एवं अपनी सामाजिक स्थिति के प्रति भी जागरूक हो कर सफलता के शिखर छू रही है वह घर व कार्यक्षेत्र दोनों की जिम्मेदारियाँ बखूबी संभाल रही हैं। भारतीय संस्कृति में स्त्री को देवी के रूप में माना गया है वर्तमान में जब स्त्री हर क्षेत्र में तरक्की कर रही है फिर भी समाज में स्त्री की दुर्दशा भी दिखाई देती है जिसका मख्य कारण दहेज है । प्रारंभ में विवाह के समय स्त्री को वस्त्र व आभूषण आदि पिता की ओर से पुत्री को भेंट किए जा आभूषण आदि पिता की ओर से पत्री को भेंट किए जाते थे जिसका आशय यही था कि विवाह के उपरान्त, पिता द्वारा अपनी पुत्री की सहायता करना होता था। परन्त खेद का विषय है कि आज यह विचार पूर्ण रूप से बदल गया है, और दहेज रूपी दानव हमारे समाज को खोखला कर रहा है। प्रत्येक धर्म व जाति इस दहेज रूपी दानव का शिकार हो रही है।दहेज एक बहआयामी, आर्थिक और सामाजिक अभिशाप है, जिसका सीधा संबंध लिग भेदभाव से है। लिग भेद की मानसिकता की जड़ इतनी गहरी व मजबूत है कि स्वयं स्त्री ही स्त्री के साथ भेदभाव अपनाती है।

हमारे संविधान में स्त्रियों को समानता का अधिकार प्राप्त है, उसके पश्चात् भी स्त्री उत्पीड़न, आत्महत्या, दहेज मृत्यु व दहेज हत्या का शिकार बन रही हैं। संविधान में स्त्री की सुरक्षा, सम्मान व अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961 पारित किया गया। उसके अंतराल दहेज प्रतिषेध (वधू-वर को दिये गये उपहारों की सूचियों का अनुरक्षण) नियम, 1985 बनें।

अकसर देखा गया है कि यदि सम्पूर्ण दहेज का भुगतान तुरन्त संभव नहीं है तो भविष्य में इसे पूर्ण करने का वचन वधु के माता पिता कर देते है। या वर पक्ष मिले दहेज से असंतुष्ट होकर और दहेज की मांग प्रारम्भ कर देता है, परन्तु जब मायके वाले इस अवशेष का भुगतान नहीं कर पाते तो नववधू पर ससुराल वालों द्वारा दबाव डाला जाता है चल व अचल सम्पत्ति की मॉग से उसे मानसिक एवं शारीरिक रूप से परेशान किया जाता है। ससुराल में ऐसा वातावरण बना दिया जाता है जिसके परिणाम स्वरूप विवाहिता आत्मग्लानि से क्षुब्ध होकर आत्महत्या कर लेती हैं। कुछ प्रकरणों में महिला की हत्या करके फाँसी पर लटका देते हैं. अथवा आत्महत्या का रूप देने के लिए मृत्यु के बाद आग से जला देते है। यह सारी घटनाएँ घर की चारदीवारी के भीतर होती हैं, क्योंकि कोई व्यक्ति न तो उस हत्या या आत्महत्या को देख पाता है, न ही कोई सहायता कर सकता है। अनेक मामलों में शव का संस्कार बिना पुलिस को सूचना दिये शीघ्र ही कर दिया जाता है।

कुछ मामलों में जहाँ ससुरालीजन जली हुई महिला को अस्पताल में झूठी सहानुभूति के लिए भरती करते हैं, वहाँ यही प्रयास किया जाता है कि मृतका घटना की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले एवं ससुरालजनों व पति के विरूद्ध कुछ न कहे। समान्य स्थिति में कोई मरना नहीं चहता क्योंकि जीवन अमूल्य है। लेकिन कभी कभी आत्महत्या के लिए महिला को उसके ससुरालीजनों या पति द्वारा उत्प्रेरित किया जाता है, और महिला में परिस्थिति का सामना करने की शक्ति समाप्त हो जाती है, तो प्रताड़ित महिला को एक ही रास्ता दिखाई देता है जो कि आत्महत्या है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 306 आत्महत्या का दुष्प्रेरण का विवरण करती है। धारा 306 के अनुसार यदि कोई व्यक्ति आत्महत्या करता है तो वह जिसने कि उसको आत्महत्या के लिए उत्प्रेरित किया है वह 10 वर्ष के कारावास या जुर्माने से दण्डित किया जाएगा। यह अपराध गैर जमानती है। भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के अनुसारधारा 306 आत्महत्या का दुष्प्रेरण - जो कोई व्यक्ति आत्महत्या करे, तो जो कोई ऐसी आत्महत्या का दुष्प्रेरण करेगा. वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी. दण्डित किया जाएगा और जमीन से भी दण्डनीय होगा।