तैयार होती बेटियाँ
December 4, 2019 • Sarvangin डॉ. इंदिरा मिश्रा

हर   सुबह चमचमाती ड्रेस पहनकर, मचिग की टाई लगाकर, जूतों के फीते बौधती हुई काम पर हाथ हिलाकर जाने के लिए तैयार बेटियों ने आज अपनी मंजिल को अपने पैरों के नीचे नाप लिया है। स्कूल जाती हुई बसों में बेटियों की खिलखिलाहट मॉलों, बाजारों, कैफे, एयरपोर्ट और अस्पतालों के काउन्टरों पर मुस्करा कर लोगों का स्वागत करती, कम्प्यूटर पर ऊँगली चलाती, कॉल सैन्टरों पर बतियाती, भाई को प्यार करती, मॉ के गले लगती, पापा को प्यार करती बेटियाँ ही तो हैं जो अनन्य ममताओं से भरी अनगिनत भूमिकाओं को निभाती भारतीय समाज में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करवा रही हैं, कार, और दाययान चलाती, नर्स, एयर हॉस्टेज और डाक्टर की भमिका में ये बेटियाँ ही तो है जो रौनक फैलाती हैं. खशियां बिखेरती हैंमस्कराहट लाती हैं। सूने से माँ के आंगन में हलचल भर जाती हैं।

अब वो गुजरे जमाने की बात हो गई जब देटियाँ अपने ही घर में पराई हुआ करती थी। समय बदला है और सोच भी बदली है। अब घर के आँगन में बेटियाँ नया इतिहास रच रही हैं। कल कहा जाता था कि बेटियाँ पराया धन है। लेकिन बेटियो ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह न पराई है और न उधार का धन, और यह भी कहा जाता था कि बेटियों में समझ नहीं होती है, कमजोर होती हैं, नाजुक होती हैं. उन्होंने इस मिथक को भी आज झुठला दिया है। आज की बेटियों बंदूकें, राईफलें, एके-47, और तोपे चला रही है। देश की फौज में शामिल होकर कड़ी चौकसी कर रही हैं। अभी पिछले ही दिनों समूचे विश्व ने देखा है कि किस तरह गणतन्त्र दिवस के अवसर पर बेटियों ने अपने साहसिक कार्यो का प्रदर्शन किया है। सैनिकों की टोलियों में ही नही बल्कि वैज्ञानिकों की टोलियों, पंचायत से लेकर लोकसभा के राजनैतिक मैचों और सदनों में, गायन, वादन, नृत्य कला और अभिनय में, खेल के मैदानों, में आज जहाँ भी आँख उठाकर देखते हैं. हमारी बेटियाँ हमें अग्रिम पंक्ति में खडी दिखाई देती हैं। वे शिक्षक भी हैं और एन.जी.ओ. के साथ काम करती सेविकाए भी। वे योगा भी करती हैं और बैंक भी चलाती है, वे घर के किचिन में स्वाद बिखेरती है तो रेस्टोरेन्टों में भी सफलतापूर्वक चलाती हैं, बेटियों ने आज घर से लेकर बाहर तक सब कुछ अपने आलोक, प्रतिभा, परिश्रम, शक्ति और सामर्थ्य से जगमगा दिया है। वे घर, समाज और देश का अनिवार्य अंग बन गई हैं। जिनके बिना देश की कल्पना भी सभव नही है।

उसकी अनिर्वायता, उसकी पहचान और उसके योगदान को उसके आंकडे कितनी बेबाकी से बताते है। 1936 में पहली विमान चालक 'सरला ढकराल से शुरू हुआ, सफर आज भारतीय वायुसेना में 1500 महिलायें सेवारत हैं। साथ ही अंजना भदौरिया को भारत सरकार ने उनके उत्कृष्ट काम के लिए स्वर्ण पदक से नवाजा था। जिसमे 94 पायलेट, 14 नैवीगैर्टस हैं। वहीं 2015 की प्रशासनिक सेवा में सबसे ऊँची रेक पाने वाली बेटियो में ईरा सिघल, रेनू राज', 'निधि गुप्ता, वन्दना रोव ने देश को यह बता दिया हैं कि वो हर उच्चता को पाने की अधिकारी हैं। देश की बेटियों उन कार्यों में में भी अपनी उत्कृष्टता साबित कर रही है जहाँ लडकों का दबदवा था। तीरदाजी में दीपिका कमारी ने 2010 में कॉमनवेल्थ गेमस में गोल्ड मैडल जीत कर यह बता दिया कि अर्जुन की तरह वो भी लक्ष्य भेदना जानती हैं। साथ ही शतरंज की दुनिया में सबसे कम उम्र की हम्पी कोनेरू' ने तहलका मचा दिया था। बॉक्सिंग की अन्तर्राष्ट्रीय खिलाडी. एम.सी. मैरी कॉम का भी यही मानना है कि सफल होने के लिये जिद्दी होना जरूरी है। यह जिद अपने सपने को पूरा करने के लिए होनी चाहिए। महिलाओं में समाज और देश की दिशा बदलने का जज्या होता है सिर्फ उन्हें सपोर्ट की जरूरत है। पहली विकलाग पर्वतारोही 'अरूणिमा सिन्हा भी आत्म विश्वास से लबालट लोगों को अनसार खद के लिए तो जीना सब को आता है जो दूसरों के लिए जीते है उनकी पहचान और सम्मान के लिए आगे आना बड़ी बात । बात है हमें अपनी ताकत पहचाननी होगी।" वहीं हचानना होगी।" वहीं भारत सरकार द्वारा रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार से नवाजी गई 'डॉ० रंजना' गुप्ता ने 'ऑल ० जना गुप्ता ने 'ऑल ट्स चाम्पयनशिप में पहला पदक जीतकर साबित कर दिया कि दिल में जज्बा हो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं। अभी का में आयोजित 'वर्ल्ड पुलिस इटरनेशनल शूटिंग चैम्पियनशिप' 2015 तीन स्वर्ण, 2 रजत और एक कॉस्य पुरस्कार समेत कई पुरस्कार जीत कर रंजना ने सिर्फ उत्तर प्रदेश पुलिस का मान बढाया है बल्कि राष्ट्र का गौरव भी बढ़ाया हैराजनीति के गलियारों में भी महिलाओं हलचल मचा रखी है। सोलहवीं लोक सभा 61 महिलायें चुन कर आयी जो अब तक की सबसे ज्यादा संख्या थी। हालांकी यह अभी कुल 11 प्रतिशत है फिर भी उम्मीद बढी है। 2011 की जनगणना विशलेषण ताजा आंकड़े बताते हैं कि 2001 से 2011 दौरन देश में महिलाओं की शिक्षा का स्तर 116 फीसदी बढ़ा है जो कि एक बड़े बदलाव को रेखांकित करता है। इस दौरान पुरूषों मुकाबले स्नातक करने वाली महिलाओं की संख्या 65 प्रतिशत बढ़ी है। वहीं पर स्नातक करने वाली महिलाओं की संख्या में 151 फीसदी इजाफा हुआ है। व्यावसायिक शिक्षा में भी बच्चियों का दखल बहुत बड़ा है। आंकड़े बताते है कि इस दौरान लड़कों के मकाबले व्यवसायिक और तकनीकि शिक्षा लेने वाली महिलाओं का प्रतिशत 196 फसिटी बढ़ा है। यह एक बदलाव की और सकेत करता है। इंजीनियरिंग के क्षेत्र में भी लडकियों की संख्या का इजाफा हआ है। 'नैशनल सैम्पल सर्वे आर्गिनाईजेशन' के मताबिक देश में करीब 16 फीसदी कार्यरत महिलायें इंजीनियरिंग क्षेत्रों में कार्य करती हैं जिसके चलते निजी क्षेत्र की कम्पनियों में भी महिला श्रम शक्ति की भागेदारी बढ़ी है। देश-विदेश की कई कम्पनियों में लडकियाँ अपने कौशल से उच्च पदों पर आसीन है। महिला शिक्षकों की संख्या 122 फीसदी तक बढ़ी है। आंकड़ों के मुताबिक 2001 म बढ़ी है। आंकड़ों के मताबिक 2001 में जहाँ इंजीनियरिंग पढाई करने वाली लडाकया या इंजीनियरिंग पढाई करने वाली लडकियों की सख्या 4.8 लाख थी वहीं अब यह 40 ला पारख से भी ज्यादा है। एक अनु' से भी ज्यादा है। एक अनमान के मुताबिक वर्ष 2025 तक भारत परी दुनियां को 13 करोड कर्मचारी प्रदान कर सकेगा। इस श्रमशक्ति का बड़ा हिस्सा महिलाएं ही होगी। वो युवा महिलायें जो तकनीकी बैकिंग, शिक्षा और आई टी सैक्टरों के साथ-साथ सैन्य बलों में भी अपना स्थान बना चुकी हैं।

आज की बेटियाँ सजग भी है आर सी और सकिय भी समर्थ भी है और परिश्रमी भासी भी पधानमन्त्री से लेकर न्यायाधीश तक का प्रधानमन्त्री से लेकर न्यायाधीश तक का सफर उसने अपने मजबत इरादों से पूरा किया है। बेटियों ने स्वंय ही अपनी कठिनाईयों के बंद दरवाजे खोले हैं उसने तंग खिडकियों के दमघोंटू वातावरण को खत्म किया है। उसने ही दहेज के दानव पराजित करने के लिए 'स्वंयवरण' का रास्ता अपनाया है। बदलाव की बयार साफ दिखाई दे रही है। जिस समाज ने कभी बेटियों के साथ भेद-भाव किया कई सुविधाओं वंचित रखा वही आज उनकी उपलब्धियों का गुणगान करते नहीं थकता, यह सोच 3 अगर बदली है तो खुद लड़कियों के अथक परिश्रम और लगन से ही। सच तो यह कि देश भर में अनगिनत बेटियाँ बिना किसी शोर-शराबे के, बिना ढिंढोरा पीटे समाज का भलाइ आर विकास के लिए चुपचाप काम किय जा रहा है, कोई देखे न देखेसहन सहा यह सच्चाई हा इस मान क्रान्ति की सबसे बड़ी शक्ति है। सरकारी गैर सरकारी प्रयासों ने भी बेटियों की या ऊर्जा को संचित करने का प्रयास किया केन्द्र सरकार की बहु चर्चित योजना 'बेटी बचाओं-बेटी पढाओं ने लोगों में जागरूकता रूकता का मन्त्र फूंका है। जिसमे सरकार ने सरकार ने यह ऐलान किया था कि लड़की और लडकों ड़का बराबर जन्मदर वाले गाँव को एक करोड रूपये का ईनाम दिया जायेगा। इसके साथ ऐसी अनेक योजनाएं राज्य सरकारों

द्वारा चलाई गई जिसके तहत-कन्यायों जन्म व उनके विकास को सुनिश्चित कर के लिए आर्थिक प्रोत्साहन के साथ-साथ उनकी बेहतर शिक्षा व पोषण की बात की गई है। हरियाणा सरकार ने भी एक बेटी के जन्म पर शुरू की गई है। इसके साथ ही पूर्व में लाडली, लक्ष्मी, धन लक्ष्मी, कन्या धन योजना भाग्यश्री आदि अनेक योजनाओं के जरिये बच्चियों के पोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य व विकास को गति प्रदान की गई है। उनके लिए विद्यालयों में शौचालय बन रहे हैं। पिछले दिनों सेल्फी विद डॉटर को भी देश भर में काफी लोकप्रियता मिली है।

स्कूल से छूटता साईकिलों का रेला इस बात का गवाह है कि गाँव हो या शहर गली हो या मुहल्ला, देश हो या विदेश हर जगह बेटियाँ अपनी खुशबू बिखेर रही हैं। परे उत्साह जोश, उंमग और विश्वास से बेटियाँ तैयार हो रही है। उनके विकास की धमक नभ थल जल में सुनाई पड़ रही है। समद्रों की लहरों को चीरकर आकाश के सीने को फाड कर अंन्तरिक्ष मे जाते हए ग्रहों और नक्षत्रों की दरी को नापकर अपनी मुटठी में कैद करते हुए समूचे विश्व ने बेटियों की क्षमता और दक्षता को देखा है। अब वह न निर्बल है न कमजोर। वो राष्ट्र की आन-बान और शान है उसकी र रोनक से देश जगमगा रहा है साथ ही सरकारी की भी बेटियों को फलने-फूलने का पूरा वातावरण दें। उनके मान-सम्मान, प्रतिष्ठा. उनकी मामा शिक्षा-दिक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा, स्वाभिमान की पूरी रक्षा हो, उनकी क्षमताओं योग्यताओं, का सही सदुपयोग हो जिससे आने वाला उनका उज्जवल भविष्य और भी सन्दर, सुखद, समृद्ध और सुरक्षित हो सके तभी राष्ट्र और समाज का कल्याण सम्भव है।