उपभोक्तावाद और पुरुष प्रधान मानसिकता की देन
December 1, 2019 • Sarvangin डॉ. इन्दिरा मिश्रा

इन दिनों ऐसी चर्चा जोरों पर है कि महानगरों में बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं, लेकिन मेरा मानना है कि ऐसा नहीं है बल्कि अब महिलाओं में अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने की हिम्मत आ गई है। पहले भी बलात्कार होते थे, लेकिन तब महिलाएं सामने नहीं आती थीं। तब रेप के ज्यादातर मामले घर में ही होते थे और चारदीवारी में ही दबे रह जाते थेबच्ची साथ बाप, चाचा या कोई और करीबी व्यक्ति बलात्कार करता था तो उस घटना को छिपा लिया जाता था। आज ऐसा नहीं है।

__मुझे लगता है कि बलात्कार व महिलाओं पर होने वाले अत्याचार की जड़ में समाज की पुरुष प्रधानता की मानसिकता ही हैहमारी सामाजिक मानसिकता, रस्मो-रिवाज और रहन-सहन हमेशा से ऐसे रहे हैं जो स्त्री की तुलना में पुरुष को श्रेष्ठ साबित करते रहे हैं। पुरुष भी हमेशा स्त्री को भोग की वस्तु समझता रहा है। टीवी सीरियलों और फिल्मों ने भी पुरुष के मन की दबी इच्छाओं को हवा दी हैआलीशान कोठियां, ब्रांडेड कपड़े, ऐशोआराम की जिंदगी और आसपास खूबसूरत महिलाओं की भीड़-टीवी पर यही सब परोसा जा रहा है। ऐसे में अपने पास ये सब चीजें नहीं होने पर खुद को श्रेष्ठ समझने की मानसिकता वाला पुरुष कुंठित और भ्रमित हो जाता है। उसके भीतर एक कॉम्पलेक्स घर कर जाता है। अपनी इसी झुंझलाहट, हार और कुंठा को निकालता है वह महिलाओं के साथ बलात्कार

महानगरों में बलात्कार की घटनाओं के पीछे की वजह यह भी है कि जब छोटे व पिछडे इलाकों में रहने वाले लोग यहां आते हैं तो महानगर का खुलापन उनके लिए नई बात होती है। अपने घर में स्त्री को छह गज की साड़ी में लिपटे हुए और लंबे बूंघट में देखने वाले पुरुष के लिए इस माहौल को पचाना मुश्किल होता है। जहां तक बलात्कार की घटनाओं पर रोक लगाने की बात है तो इसमें कानून से ज्यादा समाज की भूमिका हो सकती है, क्योंकि समाज सबसे ज्यादा ताकतवर है। इसके अलावा अगर हमारा समाज यानी हम ही जागरुक नहीं होंगे तो कानून को लागू करना कैसे संभव होगा। महिला आयोग में रहते हुए मैंने जाना कि इस तरह के मामलों में पुलिस की भूमिका अक्सर निगेटिव रहती है। थाने में रिपोर्ट लिखाने जाने पर पुलिसवाले पीड़िता और उसके परिवार को बदनामी का डर दिखाते हैं या फिर उसका मजाक उडाते हैं। पूछताछ के नाम पर उल्टे-सीधे सवाल पूछ कर पीड़ित महिला का मनासिक शोषण करते है, क्यों? कई लोगों की मांग है कि बलात्कारियों को फांसी देनी चाहिएअपने कार्यकाल के दौरान हमने 17 राज्यों में वर्कशॉप कराए। उनमें बड़े-बड़े डॉक्टरों, वकीलों, बुद्धिजीवियों और उनके एनजीओ ने हिस्सा लिया। इनमें से अधिकांश की राय थी कि छोटी बच्चियों से बलात्कार करने वाले को मौत की सजा दी जानी चाहिए। एक मासूम, जो किसी भी तरह इस वहशीपन का विरोध नहीं कर सकती, उसके साथ बलात्कार करने वाले को फांसी से कम सजा नहीं मिलनी चाहिए। हालांकि इतनी कठोर सजा के निगेटिव पक्ष भी हैं। तीन साल पहले के आंकड़ों के अनुसार, बलात्कार के मामलों में सिर्फ चार प्रतिशत को ही सजा मिल पाती थी। हो सकता है अब यह प्रतिशत बढ़ गया हो लेकिन कितना? फिर अगर आज इतने कम मामलों में सजा मिल पाती है तो फांसी जैसी कठोर सजा होने पर तो हो सकता है कि यह प्रतिशत और भी गिर जाए।

पिछले 7-8 साल में महिला आयोग द्वारा सरकार के पास कम से कम 40 बार कानून में संशोधन के लिए सिफारिशें भेजी गईं, लेकिन सरकार ने इनमें से किसी भी सिफारिश को लागू नहीं कियाअगर हम इस तरह की घटनाओं के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा देना चाहते हैं तो लैटिन अमेरिका से सीख ली जा सकती है। जैसे - बलात्कारी जिस इलाके का रहने वाला है वहां उसे सड़कों पर झाडू लगाने या नाली साफ करने की सजा दी जा सकती है। सजा ऐसी होनी चाहिए जो उसे जानकार लोगों के सामने हीन महसूस कराए, जिससे उसे अपनी गलती का हर वक्त एहसास होता रहे। इसके अलावा न सिर्फ छात्रों को बल्कि टीचरों को भी इस बारे में जागरुक किया जाना चाहिए। वैसे, मीडिया इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है